जनता दर्शन से लेकर पीएमओ/सीएम पोर्टल तक फरियाद की जमीनी हकीकत

आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,

जनता दर्शन से लेकर पीएमओ/सीएम पोर्टल तक फरियाद की जमीनी हकीकत

प्रशासनिक स्तर पर जनता की शिकायतों के त्वरित निस्तारण के दावों के बीच जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मुख्यमंत्री के जनता दर्शन से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO-PG) और राज्य के जनसुनवाई पोर्टल (IGRS) पर की जाने वाली शिकायतें निचले स्तर पर प्रशासनिक ढर्रे और अधिकारियों की आपसी मिलीभगत के कारण प्रभावी साबित नहीं हो पा रही हैं। जनता के बीच बढ़ते असंतोष और सामने आ रहे खुले पत्रों ने सीधे तौर पर इस पूरी व्यवस्था की जवाबदेही पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।
मूल समस्या: आरोपी ही जांच अधिकारी
प्रशासनिक विफलता की सबसे बड़ी और व्यावहारिक जड़ हितों का टकराव (Conflict of Interest) है। नियम और नैतिकता यह कहती है कि जिस अधिकारी के खिलाफ शिकायत हो, जांच कम से कम उससे उच्च स्तर का या निष्पक्ष अधिकारी करे। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि जब कोई पीड़ित स्थानीय लेखपाल, दरोगा, बीडीओ, खंड शिक्षा अधिकारी या नायब तहसीलदार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराता है, तो वह पत्र डिजिटल माध्यमों से घूम-फिरकर वापस उसी थाने, तहसील या ब्लॉक में पहुंच जाता है जिसके खिलाफ शिकायत की गई थी। ऐसे में आरोपी अधिकारी खुद ही अपनी जांच की रिपोर्ट तैयार करता है।
फर्जी आख्या का शॉर्टकट
प्रशासनिक अधिकारियों पर जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायतों को लंबित न रखने और जिले की रैंकिंग सुधारने का भारी दबाव होता है। इस दबाव से निपटने के लिए अधिकारियों ने कागजी निस्तारण का शॉर्टकट खोज निकाला है। बिना मौके पर जाए, बिना पीड़ित का पक्ष सुने और बिना किसी ठोस जांच के, दफ्तर में बैठकर एकतरफा मनगढ़ंत रिपोर्ट (आख्या) लगा दी जाती है कि शिकायत निराधार है या मामला पहले से न्यायालय में लंबित है। कई मामलों में प्रभावशाली लोगों के शह पर उल्टा शिकायतकर्ता पर ही केस बंद करने का दबाव बनाया जाता है।
भ्रष्टाचार और तयशुदा हिस्सेदारी का आरोप
सामने आ रहे जन-आक्रोश के मुताबिक, स्थानीय स्तर पर एक मजबूत मिलीभगत सक्रिय है। गरीबों के शोषण और सरकारी धन की बंदरबांट का एक निश्चित प्रतिशत नीचे से लेकर ऊपर की हर टेबल तक आसानी से पहुंचने के गंभीर आरोप हैं। यही वजह है कि प्रभावशाली धनबली और रसूखदार लोग सरकार किसी की भी रहे, हमेशा मलाईदार पदों और स्थानीय व्यवस्था पर अपना दबदबा बनाए रखते हैं।
स्थानीय आंदोलन और सुलगते मुद्दे
यह प्रशासनिक आक्रोश विशेष रूप से संतकबीरनगर जिले के धनघटा क्षेत्र के स्थानीय मुद्दों, एडवर्ट एकेडमी और लगभग 150 छात्रों के भविष्य से जुड़े विवादों के साथ-साथ 17 अतिपिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा दिलाने की पुरानी मांग से भी जुड़ा हुआ है। विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही अब जनता इस कागजी समाधान के खिलाफ खुलकर अपनी आवाज बुलंद करने लगी है।
सुधार के लिए जनता की प्रमुख मांगें:
क्रॉस-डिस्ट्रिक्ट जांच अनिवार्य हो: स्थानीय प्रभाव और दबाव को खत्म करने के लिए एक जिले की शिकायत की जांच दूसरे जिले के निष्पक्ष अधिकारियों से कराई जाए, जैसे संतकबीरनगर की जांच गोरखपुर का अफसर करे।
जांच की वीडियो रिकॉर्डिंग: फर्जी और मनगढ़ंत रिपोर्टों पर पूरी तरह लगाम लगाने के लिए मौके पर होने वाली जांच प्रक्रिया और बयानों की वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य की जाए।
पब्लिक ट्रैकिंग सिस्टम: जनसुनवाई पोर्टल की फाइल किस टेबल पर, किस अधिकारी के पास और किस वजह से कितने दिनों से अटकी हुई है, इसे जनता के लिए पूरी तरह सार्वजनिक किया जाए।
दोषी अफसरों पर कड़ी कार्रवाई: गलत या फर्जी आख्या लगाकर गुमराह करने वाले अधिकारियों को सिर्फ चेतावनी देने के बजाय तत्काल निलंबित कर विभागीय कार्रवाई की जाए।
बड़ा सवाल:
जब मुख्यमंत्री के जनता दर्शन में हाथ में दिया गया फरियाद पत्र भी अंततः घूम-फिरकर उसी दरोगा, लेखपाल या बीडीओ के पास जाना है जिसके खिलाफ शिकायत है, तो आम जनता को न्याय कैसे मिलेगा? जब तक जांच का यह ढर्रा नहीं सुधरेगा, तब तक प्रशासनिक सुधार और न्याय धरातल पर सिर्फ एक भाषण बनकर रह जाएगा।

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