आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,
तकनीकी सहायक, जेई, ग्राम प्रधान, बीडीओ और सचिव का नेक्सस कैसे तोड़ेगी सरकार
मनरेगा योजना में जमीनी स्तर पर तकनीकी सहायक, जूनियर इंजीनियर (जेई), ग्राम प्रधान, ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (बीडीओ) और पंचायत सचिव का नेक्सस (भ्रष्ट साठगांठ) सबसे मजबूत और पुराना माना जाता है। इसी नेक्सस के कारण तकनीकी स्वीकृतियां, कागजी मस्टर रोल और जमीनी काम में भारी हेरफेर संभव हो पाता है। इस गठजोड़ को पूरी तरह से तोड़ने के लिए सरकार प्रशासनिक सुधारों, कड़े दंडात्मक नियमों और आधुनिक तकनीक का एक त्रिस्तरीय चक्रव्यूह तैयार कर रही है जिससे भ्रष्ट तंत्र को एक सीधा और कड़ा संदेश दिया जा सके।
ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति और ग्रामीणों की भागीदारी: इस नई व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव गांव वालों को सीधे फैसले लेने की प्रक्रिया में जोड़कर किया जा रहा है। अब किसी भी ग्राम पंचायत में मनरेगा के तहत कोई भी नया काम शुरू करने से पहले ग्राम सभा (ग्रामीणों) की खुली बैठक में उनकी लिखित सहमति लेना अनिवार्य होगा। बिना ग्रामीणों की मर्जी और आम सहमति के किसी भी परियोजना को मंजूरी नहीं दी जाएगी। इसके साथ ही, जब तक ग्राम सभा काम की प्रगति और उसकी उपयोगिता से पूरी तरह संतुष्ट होकर अपनी अंतिम लिखित सहमति नहीं दे देती, तब तक उस कार्य के लिए अगला धन आवंटित (फंड रिलीज) नहीं किया जाएगा। योजना के चयन से लेकर भुगतान तक के हर चरण में ग्रामीणों को सीधे ‘अथॉरिटी’ बनाकर इस नेक्सस की मनमानी पर पूरी तरह रोक लगाई जा रही है।
तबादला और पोस्टिंग में कड़ाई: पंचायत सचिवों, तकनीकी सहायकों और जेई के लिए अधिकतम 2 से 3 साल का कार्यकाल तय किया जा रहा है। इसके बाद उनका ट्रांसफर कंप्यूटर आधारित ‘रैंडम डिजिटल ट्रांसफर’ प्रणाली से होगा, ताकि कोई राजनीतिक पैरवी काम न आए। जेई और तकनीकी सहायकों को उनके गृह ब्लॉक या गृह जिले के सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात करने पर पूरी तरह रोक रहेगी। मूल्यांकन (मेज़रमेंट) के लिए रैंडमली दूसरे ब्लॉक के जेई की ‘क्रॉस-ड्यूटी’ लगाई जाएगी।
कर्मचारियों की पारदर्शी नियुक्ति: मनरेगा से जुड़े मैदानी कर्मचारियों (रोजगार सेवक और सेक्रेटरी) की नियुक्तियों में स्थानीय राजनीतिक दखल पूरी तरह खत्म करने के लिए राज्य स्तर या मंडल स्तर पर निष्पक्ष प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए पारदर्शी भर्ती की रूपरेखा तैयार की जा रही है।
दैनिक रिपोर्टिंग का आधुनिकीकरण: रोजगार सेवक और सेक्रेटरी की खुद की हाजिरी तभी मान्य होगी, जब वे सुबह तय समय पर कार्यस्थल की भौगोलिक सीमा (जिओ-फेंस) के भीतर खड़े होकर ऐप पर अपनी लाइव सेल्फी और लोकेशन अपलोड करेंगे। हर शाम काम खत्म होने के बाद, संबंधित तकनीकी सहायक और रोजगार सेवक को उस दिन खोदे गए हिस्से का लाइव फोटो, वीडियो और माप सीधे सरकारी पोर्टल पर अपलोड करना होगा।
तकनीकी पहरा (ह्यूमन इंटरफेरेंस का अंत): काम शुरू होने से पहले, काम के बीच में और काम खत्म होने के बाद—इन तीनों चरणों में जिला मुख्यालय से भेजे गए ड्रोन कैमरों से थ्री-डी मैपिंग अनिवार्य की जा रही है। एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) सॉफ्टवेयर खुद तय करेगा कि कितनी मिट्टी खुदी है। फंड रिलीज करने का अधिकार ब्लॉकचेन आधारित ‘स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट’ को देने की योजना है, जिससे काम की पुष्टि और ग्राम सभा की डिजिटल एनओसी (सहमति) मिलते ही सीधे मजदूर के खाते में पैसा ट्रांसफर (डीबीटी) होगा और कमीशन का खेल बंद हो जाएगा।
प्रशासनिक जवाबदेही और ‘सुपरवाइजरी’ गाज: यदि किसी पंचायत में बड़ा घोटाला पकड़ा जाता है, तो केवल रोजगार सेवक या सचिव सस्पेंड नहीं होंगे, बल्कि वहां के बीडीओ और संबंधित जेई के खिलाफ भी सीधे विभागीय चार्जशीट जारी होगी। प्रमुख सचिव (ग्राम्य विकास) हर हफ्ते जिलों के डेटा की लाइव समीक्षा करेंगे। डीएम और सीडीओ को ‘लकी ड्रा सॉफ्टवेयर’ के जरिए रोज सुबह बिना बताए किन्हीं 3 साइट्स पर औचक निरीक्षण के लिए निकलना होगा। सोशल ऑडिट की जिम्मेदारी बाहरी विश्वविद्यालयों के छात्रों या स्वतंत्र राष्ट्रीय एजेंसियों को सौंपी जाएगी।
आर्थिक कमर तोड़ना और बैंक खातों का वेरिफिकेशन: यदि किसी जांच में गबन सिद्ध होता है, तो आरोपियों के निलंबन के साथ-साथ उनकी निजी चल-अचल संपत्ति को कुर्क करने का कड़ा अध्यादेश लाया जा रहा है, जिससे नुकसान की 100% भरपाई 30 दिनों में हो सके। भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए प्रधान के परिवार पर भविष्य में चुनाव लड़ने और कर्मचारियों को सेवा से बर्खास्त कर हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट किया जाएगा। इसके साथ ही, प्रशासन समय-समय पर रैंडमली मजदूरों को बुलाकर यह जांचेगा कि उनके बैंक खाते और एटीएम का नियंत्रण सचमुच उन्हीं के हाथ में है या बिचौलियों ने दबा रखा है।
कर्मचारियों से अवैध ‘चंदा वसूली’ की शिकायतों पर जिला प्रशासन सख्त: मनरेगा योजना के आंतरिक तंत्र को साफ करने के अभियान के बीच अब एक और अहम तथ्यात्मक पहलू सामने आया है। विभिन्न ब्लॉकों में तैनात तकनीकी सहायकों, जूनियर इंजीनियरों (जेई), पंचायत सचिवों और रोजगार सेवकों से कुछ स्थानीय संगठनों या अनाधिकारिक संघों द्वारा की जाने वाली अवैध चंदा वसूली की शिकायतों का जिला प्रशासन ने संज्ञान लिया है।
ब्लैकमेलिंग के नेटवर्क पर प्रहार: प्रशासनिक जांचों में यह बात स्पष्ट हुई है कि ईमानदारी से काम करने वाले तकनीकी कर्मचारियों पर मासिक या त्रैमासिक रूप से अनिवार्य चंदा देने का दबाव बनाया जाता था। चंदा न देने पर सुदूर क्षेत्रों में ट्रांसफर कराने या प्रतिकूल प्रविष्टियां दिलाने की धमकियां दी जाती थीं। इस अंदरूनी आर्थिक दबाव के कारण ही भ्रष्टाचार की चेन बनती थी, जिसे तोड़ना प्रशासन की प्राथमिकता में शामिल है।
वसूली को ‘रिश्वत’ मानकर होगी जेल: जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि मनरेगा से जुड़े किसी भी कर्मचारी से किसी भी प्रकार का नगद या डिजिटल वित्तीय लेन-देन पूरी तरह प्रतिबंधित है। यदि कोई भी संगठन जबरन चंदा मांगता पाया गया, तो उसे सीधे तौर पर ‘अवैध वसूली’ मानकर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज कर जेल भेजा जाएगा।
गोपनीय हेल्पलाइन और सीधा संरक्षण: कर्मचारियों को भयमुक्त करने के लिए डीएम और सीडीओ कार्यालय स्तर पर एक गोपनीय शिकायत प्रणाली चालू है, जहां कोई भी तकनीकी सहायक या सचिव वसूली के साक्ष्य सीधे आला अधिकारियों को सौंप सकता है। रैंडम डिजिटल ट्रांसफर नीति लागू होने से अब बिचौलियों का ट्रांसफर कराने का रसूख भी पूरी तरह खत्म हो गया है। संदिग्ध खातों की रैंडम ऑडिट भी की जा रही है।