आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,
मनरेगा में सरकारी लूट पर कैसे लगेगी लगाम?
मनरेगा में सरकारी लूट पर कैसे लगेगी लगाम? तकनीक, पारदर्शी नियुक्ति और कड़क कप्तानी से ही सुधरेगा ग्रामीण भारत का सुरक्षा कवच
ग्रामीण भारत में रोजगार और गरीब परिवारों की आजीविका का सबसे बड़ा सहारा कही जाने वाली ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ (मनरेगा) इस समय दोराहे पर खड़ी है। एक तरफ जहाँ यह योजना संकट के समय करोड़ों भूमिहीन मजदूरों के लिए सुरक्षा कवच साबित होती है, गांवों से शहरों की तरफ होने वाले पलायन को रोकती है, और जल संरक्षण (तालाब, चेक डैम) व प्रधानमंत्री आवास जैसी स्थायी संपत्तियों का निर्माण करती है—वहीं दूसरी ओर फ़र्ज़ी जॉब कार्ड, बिचौलियों की घुसपैठ और मशीनों के अवैध इस्तेमाल जैसी सरकारी लूट ने इसके मूल उद्देश्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जनता और विशेषज्ञों के बीच लगातार यह बहस चल रही है कि इस व्यापक भ्रष्टाचार के बावजूद सरकार इस योजना को बंद क्यों नहीं कर रही है? इसका सीधा जवाब यह है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाने और भुखमरी रोकने के लिए यह योजना बेहद जरूरी है। इसलिए, समाधान इसे बंद करने में नहीं, बल्कि इसके छिद्रों को बंद करने में है।
नीतिगत चर्चाओं और धरातल से मिले सुझावों के आधार पर यदि कर्मचारियों की कार्यशैली, नियुक्ति प्रक्रिया और शीर्ष अधिकारियों (प्रमुख सचिव से लेकर डीएम/सीडीओ) की जवाबदेही को कस दिया जाए, तो इस भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म किया जा सकता है:
1. कर्मचारियों की नियुक्ति और ट्रांसफर नीति में बड़ा बदलाव
जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी वजह स्थानीय साठगांठ है। रोजगार सेवक, ग्राम विकास अधिकारी (वीडीओ) और तकनीकी सहायक वर्षों तक एक ही जगह टिके रहते हैं, जिससे प्रधान और ठेकेदारों के साथ उनका एक मजबूत नेटवर्क बन जाता है।
पारदर्शी और बाहरी नियुक्तियां: मनरेगा से जुड़े मैदानी कर्मचारियों (रोजगार सेवक और सेक्रेटरी) की नियुक्तियों में स्थानीय राजनीतिक दखल पूरी तरह खत्म हो। इसके लिए राज्य स्तर या मंडल स्तर पर निष्पक्ष प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए पारदर्शी भर्ती की जाए।
अनिवार्य रोटेशन (तबादला नीति): किसी भी क्लस्टर या ग्राम पंचायत में किसी कर्मचारी को 3 साल से अधिक समय तक न रहने दिया जाए। संवेदनशील क्षेत्रों में हर 2 साल पर रैंडम डिजिटल ट्रांसफर नीति लागू हो, ताकि कोई भी स्थानीय माफिया या ठेकेदार कर्मचारियों को अपने प्रभाव में न ले सके।
2. दैनिक रिपोर्टिंग और कार्यशैली का आधुनिकीकरण
पुराने ढर्रे की कागजी कार्यशैली ही फर्जीवाड़े को छिपाने का मौका देती है। अब कर्मचारियों की डेली रिपोर्टिंग को पूरी तरह लाइव और डिजिटलाइज्ड करना होगा:
लाइव जिओ-फेंस अटेंडेंस: रोजगार सेवक और सेक्रेटरी की खुद की हाजिरी तभी मान्य हो, जब वे सुबह तय समय पर कार्यस्थल की सीमा (जिओ-फेंस) के भीतर खड़े होकर ऐप पर अपनी लाइव सेल्फी और लोकेशन अपलोड करेंगे। इससे दफ्तर या घर बैठकर फर्जी हाजिरी लगाने की आदत छूटेगी।
प्रोग्रेस की लाइव डिजिटल फीडिंग: हर शाम काम खत्म होने के बाद, संबंधित तकनीकी सहायक और रोजगार सेवक को उस दिन खोदे गए हिस्से का लाइव फोटो, वीडियो और माप सीधे सरकारी पोर्टल पर अपलोड करना होगा, जिसे ब्लॉक और जिला स्तर पर तुरंत देखा जा सके।
3. प्रशासनिक चक्रव्यूह: शासन से लेकर जिला कप्तानों की सीधी जवाबदेही
भ्रष्टाचार तब तक नहीं रुक सकता जब तक बड़े साहबों की एसी कमरों से बाहर निकलने की मजबूरी न बन जाए। प्रमुख सचिव (ग्राम्य विकास), डीएम, सीडीओ, एसडीएम और तहसीलदार को इस व्यवस्था में सीधे फ्रंटलाइन पर आना होगा:
प्रमुख सचिव स्तर से डैशबोर्ड मॉनिटरिंग: राज्य के प्रमुख सचिव हर हफ्ते जिलों के डेटा की लाइव समीक्षा करें। जिस जिले में अचानक मनरेगा खर्च बढ़ा हो या शिकायतें आ रही हों, वहां सीधे मुख्यालय से विशेष टीमें भेजी जाएं। जिलों की रैंकिंग सीधे मनरेगा की शुचिता के आधार पर तय हो।
डीएम और सीडीओ का कड़ा रुख और औचक निरीक्षण: जब जिलाधिकारी (डीएम) और मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) सुबह-सुबह अचानक किसी तालाब की खुदाई पर खुद पहुंच जाएंगे, तो फर्जी हाजिरी लगाने की हिम्मत किसी की नहीं होगी। शिकायतों पर महीनों चलने वाली कागजी जांच की जगह 24 घंटे में एफआईआर और निलंबन होना चाहिए।
रैंडम डिजिटल मॉनिटरिंग (लकी ड्रा): अधिकारियों की व्यस्तता को देखते हुए ‘लकी ड्रा सॉफ्टवेयर’ का इस्तेमाल हो। रोज सुबह कंप्यूटर रैंडमली किन्हीं गांवों का चयन करे और संबंधित एसडीएम या तहसीलदार को तुरंत वहां लाइव छापे के लिए भेजा जाए।
अधिकारियों की क्रॉस-ड्यूटी जांच: एक ब्लॉक के बीडीओ या तहसीलदार को दूसरे ब्लॉक में बिना बताए जांच के लिए भेजा जाए, ताकि स्थानीय साठगांठ का कोई मौका ही न बचे।
4. तकनीक का पहरा और कड़े दंडात्मक नियम
ब्लॉकचेन और स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट: पूरे फंड फ्लो को ब्लॉकचेन नेटवर्क पर डाला जाए ताकि केंद्र से लेकर मजदूर के खाते तक पैसे की आवाजाही पूरी तरह पारदर्शी रहे। काम पूरा होते ही बिना किसी मानवीय दखल (प्रधान या अधिकारी के दस्तखत) के सीधे पैसा ट्रांसफर हो (डीबीटी)।
ड्रोन और एआई मैपिंग: जिला प्रशासन रैंडम ड्रोन भेजकर वीडियोग्राफी कराए और एआई सॉफ्टवेयर से जांचे कि काम इंसानों ने किया है या जेसीबी मशीन से। मशीनों के पाए जाने पर उन्हें तुरंत ज़ब्त कर सीधे राजसात (सरकारी संपत्ति) घोषित किया जाए।
फास्ट-ट्रैक रिकवरी और ब्लैकलिस्टिंग: भ्रष्टाचार साबित होने पर आरोपी कर्मचारियों और प्रधानों की निजी संपत्ति कुर्क कर 30 दिनों में सरकारी पैसा वसूला जाए और उनके परिवार के चुनाव लड़ने या सरकारी ठेका लेने पर हमेशा के लिए प्रतिबंध लगे।
बैंक खातों और एटीएम कार्डों का वेरिफिकेशन: अक्सर देखा गया है कि प्रधान या बिचौलिए गरीब मजदूरों का एटीएम कार्ड और पासबुक अपने पास रख लेते हैं। प्रशासन को समय-समय पर रैंडमली मजदूरों को बुलाकर यह जांचना होगा कि उनके खाते का नियंत्रण सचमुच उन्हीं के हाथ में है या नहीं।
5. पारदर्शिता और जनता को अधिकार
पारदर्शिता की दीवार: हर ग्राम पंचायत भवन के बाहर एक बड़ी स्क्रीन या पेंट की हुई दीवार हो, जिस पर रोज सुबह यह लाइव दिखे कि आज गांव में किस-किसकी हाजिरी लगी है और किसे कितना भुगतान हुआ।
गोपनीय विजिलेंस रिवॉर्ड नीति: एक सुरक्षित पोर्टल बने जहाँ कोई भी ग्रामीण अपनी पहचान गुप्त रखकर भ्रष्टाचार का वीडियो/फोटो अपलोड कर सके। शिकायत सही पाए जाने पर उसे जब्त राशि का एक हिस्सा इनाम में मिले।
बाहरी सोशल ऑडिट (मजदूर मित्र): स्थानीय दबाव से मुक्त ऑडिट के लिए दूसरे राज्यों या दूर के जिलों के विश्वविद्यालय छात्रों को जिम्मेदारी सौंपी जाए, जो सीधे शीर्ष नेतृत्व को रिपोर्ट करें।
नागरिकों के पास कानूनी हथियार: स्वतंत्र जिला लोकपाल (ओम्बड्समैन) की सक्रियता, मनरेगा पोर्टल पर ऑनलाइन शिकायत और आरटीआई के जरिए मस्टर रोल का पूरा ब्योरा मांगना।
निष्कर्ष:
मनरेगा को लूट का अड्डा बनने से रोकने के लिए केवल कागजी नियमों की नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्यशैली में बदलाव की जरूरत है। जब नियुक्ति पारदर्शी होगी, कर्मचारियों की डेली लाइव रिपोर्टिंग होगी और शासन के प्रमुख सचिव से लेकर जिले के डीएम/सीडीओ तक कड़ाई से मैदान में उतरेंगे, तभी देश के सबसे गरीब मजदूर को उसका असली हक मिल पाएगा।