आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,
विशेष अपराध रिपोर्ट: रसूख, अंडरवर्ल्ड और एक डॉन के पतन का ऐतिहासिक दस्तावेज
नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली के सियासी गलियारों से लेकर मुंबई के अंडरवर्ल्ड और उत्तर प्रदेश के गांवों तक फैले अपराध-राजनीति के गठजोड़ का अगर कोई सबसे जीवंत और सनसनीखेज चेहरा रहा है, तो वह है रोमेश शर्मा। 70 के दशक में इलाहाबाद से एक मामूली युवक के रूप में निकले इस शख्स ने 90 के दशक तक आते-आते दिल्ली की सत्ता को अपनी उंगलियों पर नचाना शुरू कर दिया था। अपराध के इस बेताज बादशाह की कहानी किसी काल्पनिक थ्रिलर फिल्म से भी कहीं अधिक हैरान करने वाली है।
गलियों की खाक छानने से मुंबई के वरदा भाई के वरदहस्त तक
प्रयागराज के उग्रसेनपुर गांव में जन्मे रोमेश शर्मा का शुरुआती सफर बेहद साधारण था। वह कमाने-खाने की तलाश में दिल्ली आया, जहां 70 के दशक में वह गलियों में छोटा-मोटा सामान बेचता था। इसके बाद वह मुंबई पहुंच गया। मुंबई की चकाचौंध के पीछे छिपे अंडरवर्ल्ड में पैर जमाने के लिए उसने तत्कालीन सबसे बड़े डॉन वरदाराजन मुदालियर उर्फ वरदा भाई का दामन थाम लिया। वरदाराजन ने रोमेश को अपने दत्तक पुत्र की तरह माना। वरदा भाई का मुख्य काम विवादित संपत्तियों पर कब्जा करना था और रोमेश उसका सबसे बड़ा मोहरा बना।
रोमेश ने जुहू समुद्र तट के पास एक कर्ज में डूबे फिल्म निर्माता के प्लॉट पर जबरन कब्जा कर लिया, जिसका इस्तेमाल वरदा भाई के तस्करी के माल को उतारने के लिए किया जाता था। इसके बाद उसने पाली हिल्स में एक मशहूर अभिनेता के रिश्तेदार और एक नेवी अफसर के बंगलों पर भी हाथ साफ किया। इसी दौर में उसके संबंध हाजी मस्तान, करीम लाला और बाद में दाऊद इब्राहिम से भी मजबूत हुए।
चरण सिंह की शरण से संजय गांधी का शागिर्द: दिल्ली में सियासी एंट्री
मुंबई में पैसा और अंडरवर्ल्ड का रसूख बनाने के बाद रोमेश शर्मा ने दिल्ली का रुख किया। उसने समझ लिया था कि अपराध को बचाने के लिए राजनीति का कवच जरूरी है। दिल्ली आते ही उसने सबसे पहले चौधरी चरण सिंह के करीब रहकर लोकदल में पैठ बनाई। इसके बाद वह संजय गांधी का शागिर्द बन गया। 1980 में संजय गांधी के निधन के बाद उसने संजय विचार मंच के रास्ते कांग्रेस के बड़े नेताओं तक पहुंच बनाई और देखते ही देखते वह राजीव गांधी के दरबार का एक नियमित चेहरा बन गया।
90 के दशक की शुरुआत में रोमेश शर्मा का रसूख इस कदर बढ़ चुका था कि तत्कालीन चंद्रशेखर सरकार के दौरान उसे बाकायदा सरकारी वाई कैटेगरी की सुरक्षा और पीएसओ प्रदान किए गए थे। वह ऑल इंडिया किसान कांग्रेस का राष्ट्रीय सचिव भी बन चुका था।
दिल्ली में डी-कंपनी का विस्तार और भाईगिरी का नया दौर
राजनीतिक संरक्षण मिलते ही रोमेश शर्मा दिल्ली में दाऊद इब्राहिम की डी-कंपनी का मुख्य चेहरा और एक्सटेंशन बन गया। 1986 में दाऊद के दुबई भाग जाने के बाद रोमेश दिल्ली से उसकी बेनामी संपत्तियों और राजनीतिक डीलिंग्स को संभालने लगा। एक तरफ सत्ता का वरदहस्त और दूसरी तरफ दाऊद का खौफ—रोमेश शर्मा ने दिल्ली के सबसे पॉश इलाकों में आलीशान कोठियों और फार्महाउसों पर अवैध कब्जे शुरू कर दिए।
उसका तरीका बेहद शातिर था; वह पहले संपत्तियां किराए या लीज पर लेता था और फिर खाली करने के समय अबू सलेम या दाऊद के गुर्गों से मालिकों को धमकी दिलवा देता था। उसने एक व्यवसायी को उसकी पत्नी की आपत्तिजनक तस्वीरें दिखाकर कनॉट प्लेस के पास की रीगल बिल्डिंग अपने नाम करवा ली थी। 90 के दशक तक उसने दिल्ली और फरीदाबाद में 2500 करोड़ रुपये से अधिक का साम्राज्य खड़ा कर लिया था।
जब पवन हंस के मालिक का हेलीकॉप्टर ही हड़प लिया
रोमेश शर्मा की दुस्साहस की पराकाष्ठा 1996 में देखने को मिली, जब उसने पुष्पक एविएशन के मालिक एच. सुरेश राव का पूरा हेलीकॉप्टर ही हड़प लिया। 1996 के लोकसभा चुनाव में रोमेश इलाहाबाद की फूलपुर सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ रहा था। उसने सुरेश राव से चुनाव प्रचार के लिए बेल-47 हेलीकॉप्टर लीज पर लिया और झांसा दिया कि चुनाव खर्च की सीमा के चलते वह इसे कागजों पर अपने नाम करा रहा है, जिसे चुनाव बाद लौटा देगा।
परंतु चुनाव हारने के बाद उसने हेलीकॉप्टर लौटाने से साफ इनकार कर दिया और सुरेश राव को बंधक बनाकर दाऊद के खास शूटर इरफान गोगा से धमकी दिलवाकर चुप करा दिया। इस मामले में पुलिस ने शुरुआत में रिपोर्ट तक दर्ज नहीं की थी।
सुरक्षा एजेंसियों की मजबूरी और दाऊद के परिवार की ढाल
खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को रोमेश और दाऊद के संबंधों की पूरी जानकारी थी, लेकिन राजनीतिक रसूख के कारण उस पर हाथ डालना मुमकिन नहीं था। 1993 के मुंबई बम धमाकों के बाद जब सुरक्षा एजेंसियों ने दाऊद के परिवार पर शिकंजा कसा, तब रोमेश शर्मा ने अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर दाऊद की मां अमीना बी का भोपाल से महज 24 घंटे के भीतर पासपोर्ट क्लियर करवाकर उन्हें दुबई सुरक्षित भिजवा दिया था। वह संसद पहुंचने के बेहद करीब था और राज्यसभा जाने के लिए उसने तत्कालीन कुछ क्षेत्रीय क्षत्रपों से भी सांठगांठ कर ली थी।
वाजपेयी सरकार का आगमन और ताश के पत्तों की तरह बिखरा साम्राज्य
अक्टूबर 1998 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के आते ही पासा पलट गया। सुरक्षा एजेंसियों को खुली छूट मिली और रोमेश शर्मा के फोन कॉल्स टेप किए जाने लगे, जिसमें उसके और अबू सलेम के बीच यूपी पुलिस कस्टडी में बंद एक अन्य माफिया बबलू श्रीवास्तव की हत्या कराने की साजिश के पुख्ता सबूत मिले। 21 अक्टूबर 1998 को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच और सीबीआई ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए उसे छतरपुर के जय माता दी फार्महाउस से गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद आयकर विभाग ने उसकी सैकड़ों संपत्तियां कुर्क कर दीं। हेलीकॉप्टर चोरी के मामले में साल 2007 में तीस हजारी कोर्ट ने उसे दोषी मानते हुए सख्त सजा सुनाई थी।
प्रेमिका की चिता से शादी और कत्ल का रहस्य
रोमेश शर्मा की कहानी का सबसे वीभत्स और फिल्मी मोड़ उसकी लिव-इन पार्टनर और फैशन डिजाइनर कुंजुम बुधिराजा से जुड़ा है। मार्च 1999 में जब रोमेश जेल में था, तब कुंजुम की उसके छतरपुर फार्महाउस के मंदिर में बेहद बेरहमी से चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी। अगले दिन जब रोमेश पैरोल पर अंतिम संस्कार में शामिल होने आया, तो उसने श्मशान घाट पर ही कुंजुम के शव को लाल साड़ी ओढ़ाई, मांग में सिंदूर भरा और उसकी चिता से शादी की, जिसने पूरे देश को चौंका दिया था।
पुलिस का आरोप था कि कुंजुम रोमेश के सारे बेनामी राज जानती थी, इसलिए जेल से ही उसकी हत्या की साजिश रची गई। हालांकि, साल 2008 में दिल्ली हाईकोर्ट ने सबूतों के अभाव में रोमेश शर्मा को इस हत्याकांड से बरी कर दिया, जबकि उसके भतीजे सुरेंद्र मिश्रा की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी गई।
उपसंहार: एक समय दिल्ली की सत्ता को अपनी जेब में रखने का दावा करने वाला रोमेश शर्मा आज जेल की सलाखों के पीछे अपनी ढलती उम्र काट रहा है और उसका वह अकूत साम्राज्य पूरी तरह से जमींदोज हो चुका है। भारतीय अपराध के इतिहास में यह अध्याय हमेशा इस बात का गवाह रहेगा कि सत्ता का नशा और अपराध का गठजोड़ चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, उसका अंत कानून के हाथों ही होता है।