क्या ट्रायल शुरू होने के बाद Further Investigation के लिए अदालत की पूर्व अनुमति अनिवार्य होनी चाहिए ?

Bueauro,

क्या ट्रायल शुरू होने के बाद Further Investigation के लिए अदालत की पूर्व अनुमति अनिवार्य होनी चाहिए ?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि एक बार किसी आपराधिक मामले में ट्रायल शुरू हो जाने के बाद पुलिस का कोई भी अधिकारी, चाहे उसका पद कितना भी ऊंचा क्यों न हो, अदालत की पूर्व अनुमति के बिना Further Investigation का आदेश नहीं दे सकता।

जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने कानपुर नगर के जॉइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस द्वारा लंबित हत्या के मुकदमे में Further Investigation के दिए गए आदेश को Without Jurisdiction यानी अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत पहले धारा 173(8) CrPC के तहत स्थापित था और अब धारा 193(9) BNSS में इसे स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई थी कि जांच अधिकारी ने ट्रायल कोर्ट से अनुमति मांगी थी, लेकिन रिकॉर्ड की जांच के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि संबंधित आवेदन में अदालत से Further Investigation की अनुमति मांगी ही नहीं गई थी। आवेदन में केवल यह बताया गया था कि जॉइंट कमिश्नर पहले ही आगे की जांच का आदेश दे चुके हैं और उसके लिए केस डायरी उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया है।

कोर्ट ने आवेदन की भाषा पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह अनुमति मांगने वाला आवेदन नहीं था, बल्कि अदालत को पहले से लिए गए पुलिस निर्णय की जानकारी देने वाला “Arrogantly Worded” आवेदन था। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि जॉइंट कमिश्नर को Further Investigation आवश्यक लगती थी, तो उन्हें जांच अधिकारी के माध्यम से ट्रायल कोर्ट से विधिवत अनुमति मांगनी चाहिए थी।

सुप्रीम कोर्ट के Pramod Kumar v. State of Uttar Pradesh (2026) के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि ट्रायल शुरू होने के बाद अदालत की पूर्व अनुमति के बिना कोई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी Further Investigation का निर्देश नहीं दे सकता।

हाईकोर्ट ने जॉइंट कमिश्नर का आदेश रद्द करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि उस आदेश के आधार पर की गई कोई भी आगे की जांच “Non Est”, यानी कानून की नजर में अस्तित्वहीन मानी जाएगी। हालांकि, पुलिस को कानून के अनुसार ट्रायल कोर्ट से अनुमति लेकर दोबारा Further Investigation के लिए आवेदन करने की स्वतंत्रता दी गई है।

⚖️ *यह फैसला पुलिस की जांच की शक्तियों और न्यायिक निगरानी के बीच संतुलन को लेकर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।*

📌CASE: Rakesh Kumar Tiwari vs. State of U.P. & Ors. | Crl. Misc (WP)/3009/2026

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