शुचिता का सवाल और बदलते राजनीतिक प्रतिमान

आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,

शुचिता का सवाल और बदलते राजनीतिक प्रतिमान

*नई दिल्ली।* सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक विमर्श तेजी से तैर रहा है, जिसमें संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) और वर्तमान राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के कार्यकालों के दौरान मंत्रियों पर लगे आरोपों और उन पर हुई कार्रवाइयों की तुलना की जा रही है। इस विमर्श के केंद्र में यह सवाल है कि क्या समय के साथ भारतीय राजनीति में ‘हितों के टकराव’ (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ विज्ञान) और राजनीतिक शुचिता के पैमाने बदल गए हैं? प्रस्तुत है इस विषय पर एक निष्पक्ष और तथ्यात्मक पड़ताल:
यूपीए का दौर: आरोपों के साए और इस्तीफों का सिलसिला
ऐतिहासिक दस्तावेज गवाह हैं कि डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान कई हाई-प्रोफाइल मंत्रियों को महज आरोपों या विवादों के घेरे में आने के बाद अपने पदों से हाथ धोना पड़ा था।
नटवर सिंह (2005): संयुक्त राष्ट्र की वोल्कर रिपोर्ट में इराक के ‘ऑयल फॉर फूड’ कार्यक्रम में उनके बेटे का नाम आते ही पहले उनका मंत्रालय बदला गया और फिर कैबिनेट से विदाई हुई।
अशोक चव्हाण (2010): मुंबई के बहुचर्चित आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले में कारगिल शहीदों के परिवारों के लिए तय फ्लैटों के आवंटन में अनियमितता के आरोप लगते ही कांग्रेस आलाकमान ने उनसे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा ले लिया था।
पवन कुमार बंसल (2013): रेलवे बोर्ड में पदोन्नति के लिए उनके एक रिश्तेदार को रिश्वत लेते पकड़े जाने के बाद, नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्हें रेल मंत्री का पद छोड़ना पड़ा था।
अश्विनी कुमार (2013): कोयला ब्लॉक आवंटन मामले में सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में पेश करने से पहले कथित तौर पर देखने और बदलने के विवाद में उन्हें कानून मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मत: यूपीए के इस दौर में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की आक्रामक रिपोर्ट्स, सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों और एक बेहद मुखर विपक्ष के चलते सरकार लगातार रक्षात्मक मुद्रा में थी। छवि बचाने की मजबूरी और संसदीय गतिरोध को तोड़ने के लिए तब ‘इस्तीफा नीति’ को एक प्रमुख हथियार बनाया गया।
एनडीए का दौर: दबाव के आगे न झुकने की रणनीति
दूसरी ओर, वर्ष 2014 के बाद से केंद्र की सत्ता पर काबिज नरेंद्र मोदी सरकार की राजनीतिक शैली इससे बिल्कुल जुदा रही है। सोशल मीडिया पर विपक्ष द्वारा यह आरोप लगाया जाता रहा है कि वर्तमान कैबिनेट के मंत्रियों पर कार्रवाई नहीं होती। हालांकि, तथ्यात्मक स्थिति यह है कि वर्तमान सरकार के किसी भी केंद्रीय मंत्री पर अब तक अदालत या जांच एजेंसियों द्वारा वित्तीय भ्रष्टाचार का कोई मामला कानूनी रूप से सिद्ध नहीं किया जा सका है।
विपक्ष ने समय-समय पर नीतियों और क्रॉनी कैपिटलिज्म (मित्रवादी पूंजीवाद) को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए, लेकिन सरकार का रुख हमेशा अलग रहा:
सुषमा स्वराज मामला (2015): ललित मोदी को ब्रिटेन के यात्रा दस्तावेज दिलाने में कथित मदद के आरोप तत्कालीन विदेश मंत्री पर लगे। विपक्ष ने संसद ठप की, लेकिन सरकार टस से मस नहीं हुई और पूरी पार्टी उनके बचाव में खड़ी रही।
नीतिगत फैसलों पर घेराबंदी: राफेल विमान सौदे से लेकर हालिया वर्षों में हिंडनबर्ग की रिपोर्ट्स तक, विपक्ष ने ‘हितों के टकराव’ के बड़े आरोप मढ़े। परंतु, सुप्रीम कोर्ट की क्लीन चिट और कैग की रिपोर्टों को ढाल बनाकर सरकार ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया।
रणनीतिक बदलाव: भाजपा और एनडीए के शीर्ष नेतृत्व की एक घोषित रणनीति रही है—”विपक्ष के एजेंडे या दबाव के आगे घुटने नहीं टेकना।” पार्टी का मानना है कि किसी भी मंत्री का इस्तीफा स्वीकार करना विपक्ष की नैतिक जीत माना जाएगा, जिससे पूरी सरकार बैकफुट पर आ सकती है। हालांकि, छवि सुधारने या चुनावी समीकरण साधने के लिए पार्टी मुख्यमंत्रियों (जैसे गुजरात, उत्तराखंड या कर्नाटक में हुआ) या मंत्रियों के विभाग जरूर बदलती है, लेकिन उसे कभी भ्रष्टाचार पर कार्रवाई के रूप में प्रचारित नहीं होने देती।
निष्कर्ष: ईमानदारी बनाम राजनीतिक शैली का अंतर
इस तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट है कि दोनों ही कालखंडों में भ्रष्टाचार या गड़बड़ी के आरोपों की प्रकृति और उन पर मचे सियासी घमासान में कोई कमी नहीं थी। बुनियादी अंतर इस बात का नहीं है कि कौन सी सरकार अधिक पाक-साफ है, बल्कि अंतर ‘संकट प्रबंधन की राजनीतिक शैली’ का है।
जहां यूपीए सरकार गठबंधन की मजबूरियों, अदालती दखल और media trial के दबाव में आकर ‘नैतिकता के आधार पर इस्तीफे’ की राह चुनती थी, वहीं वर्तमान एनडीए नेतृत्व किसी भी आरोप के खिलाफ पूरी तरह एकजुट होकर आक्रामक काउंटर-अटैक (पलटवार) की रणनीति पर काम करता है। यही कारण है कि आज राजनीतिक शुचिता की परिभाषा पूरी तरह से बदल चुकी है।

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