यूपीए सरकार के देशव्यापी केन्द्रीकरण ने बिगाड़ी पूरी चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था, अव्यावहारिक नीति के कारण विवादों के घेरे में आई नीट परीक्षा

आलोक वर्मा, जौनपुर, ब्यूरो,

यूपीए सरकार के देशव्यापी केन्द्रीकरण ने बिगाड़ी पूरी चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था,

अव्यावहारिक नीति के कारण विवादों के घेरे में आई नीट परीक्षा

पुराने राज्य स्तरीय पैटर्न को बहाल करने की उठने लगी मांग, ऑल इंडिया स्तर की परीक्षा से बढ़ा छात्रों पर मानसिक दबाव और अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ। साल 2010 में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के दौरान पड़ी थी इस त्रुटिपूर्ण योजना की नींव, आज नीट पेपर लीक के रूप में इसका खामियाजा भुगत रहे लाखों छात्र।

आलोक वर्मा संवाददाता, जौनपुर।

देश भर में चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश के लिए आयोजित होने वाली नीट परीक्षा इन दिनों विवादों और देशव्यापी आक्रोश के केंद्र में है। नीट पेपर लीक और धांधली की लगातार सामने आ रही घटनाओं ने इस परीक्षा की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षाविदों और प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि वर्तमान संकट किसी एक एजेंसी की नाकामी नहीं, बल्कि यूपीए सरकार द्वारा थोपी गई एक केंद्रीयकृत और अव्यावहारिक नीति का परिणाम है। इस पूरी अव्यवस्था को देखते हुए अब देश में यह बहस तेज हो गई है कि आखिर चिकित्सा प्रवेश परीक्षा का पुराना पैटर्न क्यों बंद किया गया, जो हर लिहाज से सुरक्षित और व्यावहारिक था।
उल्लेखनीय है कि वर्तमान परीक्षा प्रणाली यानी नीट की नींव साल 2010 में तत्कालीन यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान ही रखी गई थी। साल 2013 में जब इसे पहली बार लागू करने का प्रयास किया गया, तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे राज्यों के अधिकारों का हनन और पूरी तरह अव्यावहारिक बताते हुए इस पर रोक लगा दी थी। हालांकि बाद में साल 2016 से इस परीक्षा को पूरे देश में अनिवार्य कर दिया गया। आज जब इस नीट परीक्षा में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और पेपर लीक की बातें सामने आ रही हैं, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि तत्कालीन यूपीए सरकार ने आखिर क्या सोचकर व्यवस्था को केंद्रीयकृत करने का प्रपोजल बनाया था। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि जो नेता आज इस संगठित लूट और भ्रष्टाचार पर आंसू बहा रहे हैं, उन्हें यह जवाब देना होगा कि इस विवादित योजना की नींव उनके समय में क्यों रखी गई थी।
अगर देश की पुरानी परीक्षा प्रणाली पर नजर डालें तो वह आज की तुलना में बेहद परफेक्ट और सुरक्षित थी। पहले प्रत्येक राज्य का अपना अलग प्री-मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम हुआ करता था और केंद्रीय स्तर पर ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट यानी एआईपीएमटी आयोजित होती थी। इसके अलावा एम्स और जिपमर जैसे प्रतिष्ठित संस्थान अपनी स्वतंत्र परीक्षाएं कराते थे। उस विकेंद्रीकृत व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह था कि यदि किसी राज्य में कोई अनियमितता या पेपर लीक जैसी घटना होती भी थी, तो उसका असर सिर्फ उसी एक प्रदेश तक सीमित रहता था। एक साथ पूरे देश के लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर नहीं लगता था, जैसा कि आज नीट पेपर के साथ देखने को मिल रहा है।
भारत जैसे विशाल और भौगोलिक विविधताओं वाले देश में एक ही दिन, एक साथ लाखों बच्चों की परीक्षा कराना अपने आप में एक बहुत बड़ी प्रशासनिक चुनौती है। पूरी सप्लाई चेन में यदि कहीं भी कोई आपराधिक तत्व या माफिया घुसपैठ कर लेता है, तो पूरे देश के छात्र एक साथ प्रभावित हो जाते हैं। इसके अलावा ऑल इंडिया लेवल पर परीक्षा होने के कारण प्रतिस्पर्धा का स्तर इस कदर बढ़ गया है कि छात्रों पर मानसिक दबाव चरम पर पहुंच चुका है। इसी दबाव का फायदा उठाकर देश भर में कोचिंग और ट्यूशन माफिया बड़ी तेजी से पनपा है।
पुरानी व्यवस्था अभिभावकों के लिए भी बेहद किफायती थी। पहले किसी राज्य का छात्र जब अपने गृह राज्य की परीक्षा देता था, तो उसे वहीं कॉलेज मिल जाता था, जिससे रहन-सहन और पढ़ाई का खर्च सीमित रहता था। लेकिन नीट की व्यवस्था लागू होने के बाद ऑल इंडिया मेरिट के चक्कर में कई बार छात्रों को अपने घर से हजारों किलोमीटर दूर दूसरे राज्यों में दाखिला लेना पड़ता है। इस स्थिति में मध्यमवर्गीय परिवारों के ऊपर सिर्फ लॉजिस्टिक मद में ही पढ़ाई का खर्च कई गुना बढ़ गया है।
कुल मिलाकर वर्तमान हालात को देखकर यह कहावत पूरी तरह सच साबित होती है कि बोए पेड़ बबूल के तो आम कहां से होय। यूपीए सरकार द्वारा थोपी गई एक त्रुटिपूर्ण और केंद्रीयकृत नीति को जबरन लागू करने का ही नतीजा है कि आज देश का भविष्य कहा जाने वाला युवा वर्ग नीट पेपर लीक के इस दलदल में फंसकर सड़कों पर उतरने को मजबूर है और पूरा सिस्टम इस संकट का समाधान ढूंढने में लाचार नजर आ रहा है।

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