राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन: बचपन की पहली मुलाकात

आलोक वर्मा जौनपुर ब्यूरो,

राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन: बचपन की पहली मुलाकात

​राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन की पहली मुलाकात अमिताभ के चौथे जन्मदिन पर हुई थी। उस समय राजीव की उम्र महज़ दो साल थी और इंदिरा गांधी नन्हें राजीव को अपनी गोद में लिए बच्चन परिवार के घर पहुँची थीं। लेकिन इस रिश्ते की नींव दोनों के जन्म से भी पहले रखी जा चुकी थी—एक तरफ पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ. हरिवंशराय बच्चन की गहरी दोस्ती थी, तो दूसरी तरफ इंदिरा गांधी और तेजी बच्चन आपस में पक्की सहेलियाँ थीं।
​जैसे-जैसे बच्चे बड़े हुए, इनकी दोस्ती और पक्की होती गई। एक दिलचस्प बात यह भी थी कि जहाँ राजीव और अमिताभ की आपस में बहुत पटती थी, वहीं संजय गांधी और अजिताभ बच्चन (अमिताभ के छोटे भाई) के बीच गहरी यारी थी।
​किशोरावस्था में बच्चन भाई नैनीताल के शेरवुड स्कूल में पढ़ते थे और गांधी बंधु देहरादून के दून स्कूल में। साल में तीन महीने की छुट्टियाँ मिलती थीं, और उन छुट्टियों में चारों दोस्त दिल्ली में नेहरू जी के निवास ‘तीन मूर्ति भवन’ में दिन भर धमाल मचाया करते थे।
​दो अलग स्वभाव और राजीव की तकनीकी कला
​चारों दोस्तों में राजीव और संजय का स्वभाव एक-दूसरे से बिल्कुल उल्टा था:
​संजय गांधी: बहुत चंचल, तूफानी, कम धैर्य वाले और दिन भर बकबक करने वाले।
​राजीव गांधी: शांत, गंभीर, धैर्यवान और ज़बरदस्त एकाग्रता (Concentration) वाले।
​राजीव का दिमाग बचपन से ही मशीनों और कल-पुर्जों में लगता था। घर का कोई भी खिलौना या मशीन हो, वे उसे खोले बिना नहीं रहते थे। कई बार तो वे खिलौना खोलकर वापस वैसा ही जोड़ भी देते थे।
​ट्रांजिस्टर वाला किस्सा:
एक बार हरिवंशराय बच्चन जी विदेश से एक ‘ट्रांजिस्टर-कम-टेप-रिकॉर्डर’ लाए। अमिताभ ने उत्सुकता में उसके सारे पुर्जे खोल दिए, लेकिन जब जोड़ने बैठे तो हवा निकल गई! बापूजी के गुस्से के डर से अमिताभ सारे पुर्जे थैले में भरकर सीधे तीन मूर्ति भवन भागे। राजीव स्क्रू-ड्राइवर लेकर बैठे, बड़ी एकाग्रता से एक-एक पुर्जे का निरीक्षण किया और ट्रांजिस्टर को दोबारा चालू कर दिया!
​दूरियाँ, पहली जींस और ‘आई कैप्टन राजीव’
​हाईस्कूल के बाद राजीव आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए और अमिताभ ने दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन सरहदें दोस्ती के बीच नहीं आईं, दोनों खतों के ज़रिए जुड़े रहे।
​राजीव की अमिताभ से खतो-किताबत इतनी नियमित थी कि एक बार खुद इंदिरा गांधी तेजी बच्चन के घर आ पहुँचीं और पूछने लगीं, “मेरा राजीव इंग्लैंड में मजे में तो है न?” जब तेजी जी ने हैरान होकर पूछा कि आपको अपने बेटे की खबर नहीं? तो इंदिरा जी मुस्कुराकर बोलीं, “मुसीबत यह है कि राजीव मुझे चिट्ठी लिखे न लिखे, लेकिन अमिताभ को खत लिखना कभी नहीं भूलता!”
​इंग्लैंड से लौटते वक्त राजीव अपने दोस्त के लिए खास उपहार लाए—एक जींस की पैंट। यह अमिताभ की ज़िंदगी की पहली जींस थी, जिसे उन्होंने सालों तक सहेजकर पहना।
​आगे चलकर राजीव ‘पायलट’ बने और अमिताभ ‘अभिनेता’। जब भी अमिताभ उस फ्लाइट में सफर करते जिसे राजीव उड़ा रहे होते, टेक-ऑफ के बाद राजीव उन्हें कॉकपिट में बुला लेते थे। अमिताभ हमेशा इस बात पर गौर करते थे कि राजीव फ्लाइट में अनाउंसमेंट करते समय कभी ‘प्रधानमंत्री का बेटा’ होने का रौब नहीं झाड़ते थे, वे बस इतना कहते—”आई कैप्टन राजीव।”
​सोनिया गांधी की भारत में एंट्री और बच्चन परिवार का स्नेह
​1968 में राजीव गांधी इटली से अपनी दोस्त सोनिया माइनो (सोनिया गांधी) के भारत आने की खबर लेकर अमिताभ के घर पहुँचे। उन्होंने तेजी आंटी से गुज़ारिश की कि सोनिया जब तक भारत में हैं, उनके घर ही रुकेंगी।
​तेजी जी ने तुरंत हाँ कह दी। ठंड का मौसम था, तो बच्चन परिवार ने रातों-रात घर चमकाया, गीज़र लगवाए और परदे बदले। जिस रात सोनिया आने वाली थीं, राजीव अपनी नर्वसनेस छुपाने के लिए अमिताभ को अपने ही घर रोक लेते हैं। रात के 3:30 बजे की फ्लाइट से सोनिया आईं। सुबह के 4 बजे राजीव ने सोचा कि इतनी सुबह बच्चन परिवार को परेशान करना ठीक नहीं, तो वे सोनिया और अमिताभ के साथ दो घंटे तक दिल्ली की सुनसान सड़कों पर गाड़ियाँ घुमाते रहे।
​सोनिया जी ‘मिशन मैरिज’ के तहत भारत आई थीं। उन्हें इंदिरा गांधी से मिलाने और बात पक्की कराने की ज़िम्मेदारी तेजी बच्चन ने उठाई। पूरे दो महीने सोनिया बच्चन परिवार के साथ एक सदस्य की तरह रहीं।
​विवाह, कन्यादान और रक्षासूत्र का चमत्कार
​जब शादी का दिन तय हुआ, तो तेजी बच्चन के उत्साह का ठिकाना नहीं था। अमिताभ के जन्म के बाद से ही उनकी एक बेटी की ख्वाहिश थी, जो सोनिया में पूरी हो रही थी।
​सोनिया और राजीव के विवाह में कन्यादान कवि हरिवंशराय बच्चन और तेजी बच्चन ने किया।
​शादी से एक दिन पहले अमिताभ ने सोनिया से राखी बंधवा ली, जिससे वे हिंदू रीति-रिवाज से उनके भाई बन गए।
​यह राखी केवल रस्म नहीं थी। सोनिया की बांधी राखी अमिताभ महीनों अपनी कलाई पर सहेजकर रखते थे।
​1982 की भयानक घटना:
जब ‘कुली’ फिल्म के हादसे के बाद अमिताभ ब्रीचकैंडी अस्पताल में ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे थे, तब कई मेडिकल प्रक्रियाओं के लिए डॉक्टरों ने उनकी कलाई से वह राखी हटाने की कोशिश की। लेकिन अमिताभ टस से मस नहीं हुए। उन्हें अटूट विश्वास था कि सोनिया की बांधी यह राखी उनकी जान बचाएगी, और डॉक्टर्स को भी अपनी ज़िद छोड़नी पड़ी।
​अंत
​समय का चक्र बदला और राजीव गांधी के असमय स्वर्गवास के बाद इस भाई-बहन और दोनों परिवारों के ऐतिहासिक रिश्ते में दरार आ गई। यह दरार क्यों आई, यह आज भी इतिहास का एक अनसुलझा रहस्य ही है।

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