कहानी: वकील साहब
हमारे पड़ोस में वकील साहब रहते थे। पूरा हरा-भरा परिवार था, तीन बेटे, एक बेटी, बहुएं, नाती-पोता सब थे। उनकी पत्नी एकदम धर्म-कर्म में लीन रहने वाली महिला थीं। वकील साहब को गाँव-जवार और पूरे मोहल्ले में सब लोग बड़े आदर से ‘शर्मा जी’ कहते थे।
शर्मा जी के बड़े बेटे दिल्ली में सरकारी अफसर थे, छोटे बंगलौर में किसी प्राइवेट कंपनी में काम करते थे, और मंझले बेटे शर्मा जी के साथ रहकर अपना कारोबार संभालते थे। बेटी का भी अपना ससुराल-परिवार था। शर्मा जी अदालत में दूसरों के बड़े-बड़े मुकदमे जीतते थे, और घर-बाहर एकदम हंसमुख व दिल के साफ़ इंसान थे।
सब कुछ बढ़िया चल रहा था कि एक दिन अचानक शर्मा जी के पेट में तेज़ दर्द उठा। डॉक्टर को दिखाया गया, तो डॉक्टर साहब जाँच करके बोले कि पित्त की थैली में पथरी हो गई है, बिना ऑपरेशन के ठीक नहीं होगा। वकील साहब अस्पताल में भर्ती हुए। भगवान की दया से ऑपरेशन सही-सलामत हो गया और तीन दिन में अस्पताल से छुट्टी मिल गई।
घर आने पर वकील साहब को देखने के लिए लोगों की भीड़ लग गई। कचहरी के साथी, हित-मित्र, नातेदार-रिश्तेदार सब हाल-चाल पूछने आते रहे। पर शर्मा जी की आँखें तो दरवाज़े पर बैठकर अपने उन बच्चों को ढूँढ रही थीं जो दूर थे। बड़े बेटे को दिल्ली से छुट्टी न मिलने के कारण आने का मौका नहीं मिला, छोटे को बंगलौर में नौकरी की लाचारी ने रोक रखा था, और बेटी भी ससुराल की मजबूरी के कारण अपने बाबूजी को देखने न आ सकी।
शर्मा जी रोज शाम को बाहरी दालान में कुर्सी डालकर गली की ओर देखते रहते। आँखों में बेटों और बेटी को देखने की तड़प तो बहुत थी, पर मुँह से कभी कुछ नहीं बोले। कुछ भाव कहे नहीं जाते, पर अपने उसे बिना कहे समझ जाते हैं।
पास रहते मंझले बेटे को बाबूजी का यह छुपा दर्द दिख रहा था। फोन पर तो बात रोज होती थी, पर जो दर्द आमने-सामने बैठकर बाँटा जाता है, वह फोन पर कहाँ! मंझले बेटे अकेले दिन-रात सेवा में लगे रहे। इधर बाबूजी तो उधर दूर बैठे बच्चे एक-दूसरे से मिलने के लिए छटपटाते रह गए। हाय रे कर्म की गति!
धीरे-धीरे समय बीतने लगा, वकील साहब ठीक हो गए और फिर से कचहरी जाने लगे।
पर विधाता को तो कुछ और ही मंजूर था। एक दिन अचानक वकील साहब की तबियत फिर बिगड़ गई। डॉक्टर को दिखाया गया, दवाई भी हुई, पर इस बार कोई आराम नहीं मिला। तबियत दिन-पर-दिन गिरती ही गई। काल का क्रूर पंजा इंसान को कैसे चुपके से जकड़ लेता है, यह सब हो जाता है और इंसान को भनक तक नहीं लग पाती।
और फिर एक रात ऐसी आई कि वकील साहब हमेशा-हमेशा के लिए आँख मूँद लिए।
उनके जाने की खबर सुनते ही सब भागे-भागे आए—दोनों बेटे, बेटी, बहुएं, नाती-पोता, सब पहुँचे। सब बिलख-बिलख कर रोने लगे, पर अब क्या फायदा… वकील साहब तो चिर निद्रा में सो चुके थे।