आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,
लखनऊ में एलडीए की ‘लैंड पूलिंग’ योजना पर उठे सवाल; किसानों की जगह निवेशकों को फायदा पहुंचाने के आरोप
आलोक वर्मा संवाददाता
लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) की महत्वाकांक्षी ‘लैंड पूलिंग’ नीति के क्रियान्वयन में गंभीर प्रशासनिक चूक और विसंगतियों के आरोप सामने आए हैं। सुल्तानपुर रोड पर प्रस्तावित दो अत्याधुनिक टाउनशिप—’वेलनेस सिटी’ और ‘आईटी सिटी’—में इस नीति के लागू होने के बाद, स्थानीय नागरिक निकायों और किसान संगठनों ने बड़े पैमाने पर बेनामी निवेश और नियमों में ढिलाई का आरोप लगाते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।
आरोप है कि जिस योजना को मूल रूप से किसानों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए लाया गया था, उसकी कमियों का फायदा उठाकर बड़े बिल्डरों, निवेशकों और कथित तौर पर कुछ विभागीय अधिकारियों ने करोड़ों रुपये का अनुचित लाभ कमाया है।
नीति और विसंगति का गणित
उत्तर प्रदेश सरकार की लैंड पूलिंग नीति के तहत, किसान अपनी कृषि भूमि स्वेच्छा से विकास प्राधिकरण को सौंपते हैं। इसके बदले में उन्हें कुल अधिग्रहीत भूमि का 25 प्रतिशत हिस्सा पूर्ण रूप से विकसित आवासीय या व्यावसायिक प्लॉट के रूप में वापस मिलता है। जानकारों के मुताबिक, विकास के बाद इस 25 प्रतिशत भूखंड की बाजार कीमत मूल कृषि भूमि की तुलना में 10 से 100 गुना तक बढ़ जाती है।
विवाद की मुख्य जड़ योजना की घोषणा और जमीन की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाने के बीच का समय अंतराल (टाइम लैग) है। लखनऊ जनकल्याण महासमिति के दावों के अनुसार, एलडीए ने करीब डेढ़ साल पहले इन दोनों शहरों में लैंड पूलिंग की घोषणा की थी, लेकिन इस क्षेत्र में नई रजिस्ट्रियों और जमीनों की बिक्री पर वैधानिक रोक लगाने में करीब एक साल की देरी कर दी गई।
‘बेनामी’ निवेश और अधिकारियों पर आरोप
इस एक साल के विलंब का परिणाम यह हुआ कि क्षेत्र में अचानक नई रजिस्ट्रियों की बाढ़ आ गई। आरोप है कि बड़े बिल्डरों और बाहरी निवेशकों ने स्थानीय सीधे-साधे किसानों से बेहद कम दामों पर जमीनें खरीद लीं और बाद में खुद को भूमि मालिक दिखाकर एलडीए के साथ लैंड पूलिंग के अनुबंध कर लिए।
इससे भी गंभीर आरोप एलडीए के ही कुछ आला अधिकारियों और कर्मचारियों पर लग रहे हैं। स्थानीय सूत्रों और शिकायतों के अनुसार, प्राधिकरण के कुछ अधिकारियों ने अपने करीबियों, ड्राइवरों, घरेलू सहायकों और रिश्तेदारों के नाम पर इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ‘बेनामी’ जमीनें खरीदीं, ताकि भविष्य में नामांतरण (म्यूटेशन) के जरिए इस 100 गुना मुनाफे वाली योजना का सीधा लाभ उठाया जा सके।
एलडीए का पक्ष और ‘नैमिष नगर’ पर असर
इन आरोपों के विपरीत, लखनऊ विकास प्राधिकरण के आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि लैंड पूलिंग नीति पूरी तरह पारदर्शी है और इसके तहत सैकड़ों बीघा जमीन के वैध अनुबंध किए जा चुके हैं। प्रशासन का तर्क है कि इस नीति से शहर के विकास को गति मिली है और किसी भी वैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं हुआ है।
हालांकि, प्रशासनिक हलकों में इस चूक को अंदरूनी तौर पर स्वीकार किए जाने के संकेत भी मिल रहे हैं। जानकारों का कहना है कि इसी विवाद और विसंगतियों से सबक लेते हुए, एलडीए ने अपनी अगली बड़ी परियोजना ‘नैमिष नगर’ में लैंड पूलिंग नीति से दूरी बनाने का फैसला किया है, जो इस बात की पुष्टि करता है कि पिछली योजनाओं में प्रक्रियात्मक खामियां रही थीं।
निष्कर्ष और जांच की मांग
यह मामला अब एक बड़े नीतिगत विवाद का रूप ले चुका है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों का कहना है कि यदि मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) के संज्ञान में लाकर इस पूरे डेढ़ साल के दौरान हुई रजिस्ट्रियों, खरीदारों के बैंक खातों और उनके एलडीए अधिकारियों से संबंधों की निष्पक्ष जांच कराई जाए, तो यह राज्य का एक बड़ा भूमि घोटाला साबित हो सकता है। फिलहाल, मूल किसान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, जबकि कागजों पर यह योजना उनके कल्याण के लिए ही बनाई गई थी।