आईजीआरएस पोर्टल पर ‘कागजी समाधान’ का खेल, अफसरों की जालसाजी से जनता का टूटा भरोसा

Alok Verma, Jaunpur Bueauro,

आईजीआरएस पोर्टल पर ‘कागजी समाधान’ का खेल, अफसरों की जालसाजी से जनता का टूटा भरोसा

उत्तर प्रदेश सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी प्रशासनिक व्यवस्था जनसुनवाई पोर्टल यानी आईजीआरएस इस समय भ्रष्टाचार और घोर लापरवाही का अड्डा बन चुकी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सख्त आदेश है कि पीड़ित की समस्या का समाधान तय समय में और पूरी ईमानदारी से हो। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सूबे के बेलगाम अफसर मुख्यमंत्री के इन आदेशों को ठेंगा दिखा रहे हैं। अफसरों ने अपनी नाकामी छुपाने के लिए अब एक नया और खतरनाक रास्ता निकाल लिया है— ‘कागजी समाधान’।
दफ्तरों के बंद कमरों में, एसी की हवा खाते हुए अधिकारी और कर्मचारी बैठकर ही फाइलों का पेट भर रहे हैं। बिना मौके पर पैर रखे, बिना पीड़ित का चेहरा देखे और बिना किसी वास्तविक जांच के, कंप्यूटर पर एक क्लिक करके लिख दिया जाता है कि ‘शिकायत का निस्तारण कर दिया गया है’। यह आम जनता के साथ सीधा धोखा और प्रशासनिक जालसाजी है।
सबसे शर्मनाक स्थिति ग्रामीण इलाकों की है। जमीन पर अवैध कब्जे, दबंगों की गुंडागर्दी, कोटेदारों की चोरी और नालियों के विवाद को लेकर जब कोई गरीब ग्रामीण हिम्मत जुटाकर पोर्टल पर गुहार लगाता है, तो उसे उम्मीद होती है कि लखनऊ से कोई कड़ा आदेश आएगा। लेकिन कुछ दिन बाद जब वह अपनी शिकायत का स्टेटस चेक करता है, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक जाती है। पोर्टल पर रिपोर्ट लगी होती है कि ‘प्रार्थी मौके पर संतुष्ट पाया गया’। सवाल यह है कि जब कोई अधिकारी गांव आया ही नहीं, जब पीड़ित से किसी ने बात तक नहीं की, तो फिर अधिकारी को सपने में कैसे पता चल गया कि प्रार्थी संतुष्ट हो चुका है?
दरअसल, यह पूरा खेल जिलों की रैंकिंग सुधारने और अपनी खाल बचाने के लिए खेला जा रहा है। शासन स्तर से शिकायतों को पेंडिंग न रखने का दबाव होता है। इस दबाव से निपटने के लिए अफसरों ने शॉर्टकट ढूंढ लिया है। समय सीमा खत्म होने से पहले ही एक झूठी और काल्पनिक आख्या तैयार की जाती है और उसे पोर्टल पर अपलोड करके मामले को बंद दिखा दिया जाता है। कागजों पर जिला नंबर वन बन जाता है, अफसरों की पीठ थपथपा दी जाती है, लेकिन पीड़ित नागरिक न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर रहता है।
जब मुख्यमंत्री की सीधे निगरानी वाली व्यवस्था का यह हाल है, तो फिर आम आदमी अपनी फरियाद लेकर आखिर जाए तो कहां जाए? इस कागजी खेल ने जनता के भीतर सरकार और कानून के प्रति भरोसे को तार-तार कर दिया है।
अब केवल हवा-हवाई निर्देशों से काम नहीं चलने वाला। सरकार को अगर इस व्यवस्था की साख बचानी है, तो इस ‘डिजिटल धोखाधड़ी’ को रोकना होगा। जब तक फर्जी रिपोर्ट लगाने वाले लेखपाल, सेक्रेटरी, थानेदार या किसी भी जांच अधिकारी को सीधे सस्पेंड नहीं किया जाएगा, जब तक उनकी सैलरी नहीं रोकी जाएगी और जब तक उनके खिलाफ जालसाजी का मुकदमा दर्ज नहीं होगा, तब तक यह अफसरशाही ऐसे ही जनता की आंखों में धूल झोंकती रहेगी। जनता को आंकड़े नहीं, जमीन पर न्याय चाहिए।

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