Alok Verma, Jaunpur Bueauro,
गोमती नदी प्रदूषण पर सवाल बरकरार, जौनपुर में सीवेज प्रबंधन की प्रभावशीलता पर चर्चा
जौनपुर। गोमती नदी में प्रदूषण का मुद्दा वर्षों से चिंता का विषय बना हुआ है। विभिन्न अध्ययनों, न्यायिक कार्यवाहियों और समाचार रिपोर्टों से यह स्पष्ट होता है कि जौनपुर शहर में नदी पर सीवेज और ठोस अपशिष्ट का दबाव लंबे समय से बना हुआ है।
वर्ष 2015 में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया था कि जौनपुर में नगर क्षेत्र का सीवेज कई नालों के माध्यम से गोमती में पहुंच रहा था तथा उस समय शहर में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) की अनुपस्थिति का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के हवाले से कहा गया था कि जौनपुर में प्रतिदिन लगभग 21.4 MLD सीवेज उत्पन्न होता है।
गोमती नदी की जल गुणवत्ता पर किए गए एक शैक्षणिक अध्ययन में भी पाया गया कि शहर से गुजरते समय नदी की गुणवत्ता प्रभावित होती है और घरेलू अपशिष्ट, सीवेज तथा कचरे का असर जल गुणवत्ता पर पड़ता है।
हाल ही में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के समक्ष जौनपुर की आदि गंगा गोमती की स्थिति का मामला पहुंचा। संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट में नदी की ओर जाने वाले तीन नालों का उल्लेख किया गया, जिनमें से एक को सीवेज उपचार व्यवस्था से जोड़ा गया था जबकि दो नाले बिना टेपिंग के पाए गए। NGT ने संबंधित अधिकारियों को शेष नालों को भी टेप कर नदी में प्रदूषण रोकने के निर्देश दिए। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने बताया कि इन नालों को अमृत 2.0 योजना के अंतर्गत जोड़े जाने की प्रक्रिया प्रस्तावित है।
इन तथ्यों के बीच स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों की ओर से यह मांग उठती रही है कि जौनपुर में संचालित सीवेज और नदी संरक्षण परियोजनाओं की वर्तमान स्थिति, उनकी क्षमता, खर्च की गई धनराशि तथा वास्तविक परिणामों का सार्वजनिक ऑडिट कराया जाए। उनका कहना है कि यदि नदी में अब भी कचरा और प्रदूषित जल पहुंच रहा है तो संबंधित व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता की समीक्षा आवश्यक है।
हालांकि उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों से यह स्पष्ट रूप से सत्यापित नहीं हो सका है कि जौनपुर की STP और अमृत योजना पर कुल ₹500 करोड़ से अधिक खर्च हुआ है अथवा किसी जांच एजेंसी ने इन परियोजनाओं में भ्रष्टाचार की आधिकारिक पुष्टि की है। इसलिए ऐसे दावों की स्वतंत्र जांच और आधिकारिक अभिलेखों से पुष्टि आवश्यक होगी।
गोमती नदी पूर्वांचल की महत्वपूर्ण जलधारा है। ऐसे में पर्यावरणविदों का मानना है कि नदी संरक्षण योजनाओं की नियमित निगरानी, पारदर्शिता और जनभागीदारी से ही प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों को प्रभावी बनाया जा सकता है।