आंदोलन अब सड़कों की सीमाओं से निकलकर हर भारतीय परिवार के ड्राइंग रूम तक – सरकार और मीडिया की अनदेखी से युवा गोलबंद 

आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,

आंदोलन अब सड़कों की सीमाओं से निकलकर हर भारतीय परिवार के ड्राइंग रूम तक –

सरकार और मीडिया की अनदेखी से युवा गोलबंद 

इस आंदोलन की सबसे बड़ी और गहरी ताकत यही है कि इसने उन लाखों-करोड़ों छात्रों के दिलों में भी आग लगा दी है जो दिल्ली के जंतर-मंतर या सड़कों पर मौजूद नहीं हैं। अपने-अपने कमरों, हॉस्टलों और छोटे शहरों के कोचिंग सेंटरों में बैठे युवाओं के बीच यह भावना गहराई से घर कर गई है कि यह केवल कुछ सौ या कुछ हजार प्रदर्शनकारियों की लड़ाई नहीं, बल्कि उनके अपने अस्तित्व, स्वाभिमान और भविष्य की लड़ाई है।
​जब परीक्षा का पेपर लीक होता है या सालों की मेहनत कौड़ियों के भाव बिकती है, तो उसका दर्द सिर्फ दिल्ली में लाठी खाने वाले छात्र को नहीं होता; वह टीस देश के कोने-कोने में बैठकर रात-रात भर पढ़ाई करने वाले हर एक युवा को चुभती है। यही ‘पिंच’ (कसक) आज युवाओं को एक-दूसरे के करीब ला रही है। जो बच्चे कल तक यह सोचकर किताबों में डूबे थे कि राजनीति और आंदोलनों से दूर रहना ही बेहतर है, आज उन्हें यह समझ आ गया है कि खामोश रहना अपनी ही मेहनत पर पानी फेरने जैसा है।
​इसी के साथ, युवाओं का आक्रोश केवल प्रशासनिक नाकामी तक सीमित नहीं है—उसका बड़ा हिस्सा देश की मुख्यधारा की मीडिया और सरकारी रवैये के खिलाफ भी है।
​युवाओं में इस बात को लेकर जबरदस्त गुस्सा है कि गोदी मीडिया या तो उनके आंसुओं और लाठियों को नजरअंदाज कर रहा है या फिर उनके स्वतःस्फूर्त और अहिंसक विरोध को किसी खास एजेंडे या साजिश के रूप में चित्रित करने की कोशिश कर रहा है। जब देश की भावी पीढ़ी सड़कों पर पिट रही हो और मीडिया स्क्रीन पर टीवी डिबेट्स में असली मुद्दों को दरकिनार किया जा रहा हो, तो यह उपेक्षा युवाओं के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा काम करती है।
​लेकिन डिजिटल युग के इस दौर में अब जानकारी और सच्चाई को दबाना मुमकिन नहीं रहा। मुख्यधारा की मीडिया के कैमरे भले ही जंतर-मंतर की तरफ न घूम रहे हों, लेकिन युवाओं के मोबाइल कैमरों ने पूरी सच्चाई को देश के हर घर तक पहुँचा दिया है। सरकार और मीडिया की इस अनदेखी ने युवाओं को और अधिक गोलबंद कर दिया है।
​अब यह लड़ाई केवल नीट या किसी एक परीक्षा के निरस्तीकरण की नहीं रह गई है; यह भारत के उस युवा वर्ग का उद्घोष है जो यह जता देना चाहता है कि उसे अब और बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता। जब घर पर बैठा छात्र भी खुद को इस लड़ाई का हिस्सा मानने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि आंदोलन अब सड़कों की सीमाओं से निकलकर हर भारतीय परिवार के ड्राइंग रूम तक पहुँच चुका है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *