आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,
एक तरफ छात्र पिट रहे थे, दूसरी तरफ मोदी हंस रहे थे’: प्रदर्शनकारियों का तीखा आरोप
नई दिल्ली: आँसू गैस के गोले और लाठीचार्ज भी नहीं रोक सका युवाओं का सैलाब; जंतर-मंतर से संसद भवन तक छात्रों का कब्ज़ा
नई दिल्ली: राजधानी की सड़कों पर युवाओं का आक्रोश अब पूरी तरह बेकाबू होता नज़र आ रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली और बेरोज़गारी के विरोध में जंतर-मंतर पर शुरू हुआ आंदोलन अब संसद भवन के आसपास के पूरे इलाके में फैल चुका है। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस द्वारा छोड़े गए आँसू गैस के गोले और कड़ा लाठीचार्ज भी युवाओं के हौसलों को तोड़ नहीं सका। भारी पुलिसिया कार्रवाई के बावजूद छात्र सड़कों से हटने को तैयार नहीं हैं, जिससे सरकार और प्रशासन हिल गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में युवाओं के जुटने की उम्मीद न तो दिल्ली पुलिस को थी और न ही खुफिया एजेंसियों को।
सड़कों पर पुलिस का बल प्रयोग और जवानों की दुविधा
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियोज़ के मुताबिक, पुलिस ने बल प्रयोग करते हुए कई राउंड आँसू गैस के गोले दागे और लाठियाँ भांजीं, लेकिन प्रदर्शनकारियों का जमावड़ा कम होने के बजाय लगातार बढ़ता जा रहा है।
प्रशासनिक लाचारी: लाठीचार्ज और आँसू गैस के इस्तेमाल के बावजूद जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर छात्रों का डटे रहना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
जनता का तर्क: प्रदर्शन कर रहे युवाओं का कहना है कि लाठी चलाने वाले पुलिसकर्मियों के अपने बच्चे भी इन्हीं परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, इसलिए यह लड़ाई सिर्फ़ छात्रों की नहीं, बल्कि हर आम परिवार के भविष्य की है।
संसद की दूरी और राजनेताओं का रवैया
संसद भवन से महज़ कुछ दूरी पर हो रहे इस अभूतपूर्व प्रदर्शन के बीच आंदोलनकारियों का आरोप है कि सरकार युवाओं की वास्तविक समस्याओं से पूरी तरह आँखें मूँदे हुए है:
रोज़गार के वादों पर घेराबंदी: युवाओं का कहना है कि हर साल लाखों-करोड़ों रोज़गार देने के दावों की हकीकत आज नई दिल्ली की सड़कों पर लाठी खाते और आँसू गैस का सामना करते छात्रों के रूप में सामने है।
जवाबदेही पर सवाल: पेपर लीक जैसे गंभीर मामलों के बावजूद शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग न सुने जाने और शीर्ष नेतृत्व के असंवेदनशील रवैये को लेकर छात्रों में भारी आक्रोश है।
ईवीएम और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल
आंदोलनकारियों का मानना है कि जनप्रतिनिधियों में जनता का डर खत्म होने की मुख्य वजह चुनावी व्यवस्था और ईवीएम पर बना अविश्वास है। युवाओं का कहना है कि जब तक सरकार को जनता के वोटों की असली ताकत का अहसास नहीं होगा, तब तक इसी तरह जन-आक्रोश की अनदेखी की जाती रहेगी।