Alok Verma, Jaunpur Bueauro,

बॉम्बे हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: ‘नागरिक सरकार के गुलाम नहीं हैं’
बॉम्बेहाईकोर्ट (जस्टिस माधव जामदार और जस्टिस एम. एम. साठये की पीठ) का यह फैसला कानून, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस पूरे मामले के मुख्य कानूनी बिंदु और अदालत की टिप्पणियां इस प्रकार हैं:
मामले की पृष्ठभूमि: यह मामला सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के सचिव सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी से जुड़ा था। उनके खिलाफ CAA, एनआरसी और ज्ञानवापी विवाद से जुड़े विरोध प्रदर्शनों को लेकर 5 FIR दर्ज की गई थीं। इसके आधार पर मुंबई पुलिस ने उन्हें एक साल के लिए ‘जिला बदर’ (Externment Order) करने का आदेश जारी किया था, जिसे याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
विरोध का अधिकार: अदालत ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करना और लोकतांत्रिक ढंग से सरकार की नीतियों से असहमति व नारेबाजी करना देश के हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। यह कोई ऐसा अपराध नहीं है जिसके लिए किसी को जिला बदर कर दिया जाए।
पुलिस की भूमिका: पीठ ने याद दिलाया कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी किसी राजनीतिक दल या सत्ता में बैठे लोगों के निजी सेवक नहीं हैं, बल्कि वे जनता के सेवक (Public Servants) हैं। उन्हें कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहिए।
अदालत का अंतिम फैसला: हाईकोर्ट ने पुलिस द्वारा जारी जिला बदर के आदेश को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में साफ किया कि यह कार्रवाई भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन थी।