Alok Verma, Jaunpur Bueauro,
राज्य उपभोक्ता आयोगों की बदहाली: न्याय में विलंब, न्याय से वंचित करने के समानस: त्येंद्र श्रीवास्तव
लखनऊ. आज उत्तर प्रदेश राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान जो दृश्य देखने को मिला, उसने न्यायिक व्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए।
यह मामला शाहजहांपुर के युवा अधिवक्ता श्री प्रियम चौहान से संबंधित है। श्री प्रियम चौहान स्वयं अधिवक्ता हैं तथा उनके स्वर्गीय पिता भी शाहजहांपुर जनपद में लंबे समय तक प्रतिष्ठित अधिवक्ता के रूप में विधिक सेवाएं प्रदान करते रहे। विधि व्यवसाय से जुड़े इस परिवार ने सदैव न्याय व्यवस्था में विश्वास रखा है, किंतु आज वही परिवार न्याय प्राप्त करने के लिए अनावश्यक विलंब का सामना कर रहा है।
मामले के तथ्य यह हैं कि एक मोटरसाइकिल दुर्घटना में मृत्यु के उपरांत बीमा दावा प्रस्तुत किया गया था। जिला उपभोक्ता आयोग ने लगभग ₹15 लाख का बीमा दावा स्वीकृत कर दिया, किंतु यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी ने केवल इस आधार पर अपील दाखिल कर दी कि बीमा दस्तावेज में नामिनी संबंधी प्रविष्टि में त्रुटि थी।
आज राज्य आयोग में प्रियम चौहान की ओर से वकालतनामा प्रस्तुत किया गया। सुनवाई के दौरान यह अपेक्षा थी कि मामले पर शीघ्र विचार होगा, क्योंकि यह एक दुर्घटना बीमा दावा है और ऐसे मामलों में पीड़ित परिवार को त्वरित राहत मिलना कानून का मूल उद्देश्य है। किंतु आश्चर्यजनक रूप से मामले में अगली तिथि 15 जुलाई 2027 नियत कर दी गई।
यहां प्रश्न किसी न्यायाधीश विशेष का नहीं है। न्यायालय उपलब्ध संसाधनों और सीमित न्यायिक सदस्यों के साथ कार्य कर रहे हैं। वास्तविक प्रश्न उस व्यवस्था का है जिसने उपभोक्ता आयोगों को इतने गंभीर मानव संसाधन संकट में छोड़ दिया है कि एक साधारण बीमा अपील में भी लगभग एक वर्ष की तिथि दी जा रही है।
यदि राज्य उपभोक्ता आयोगों में अध्यक्षों और सदस्यों के पद रिक्त पड़े हैं, यदि पर्याप्त पीठों का गठन नहीं हो रहा है और यदि हजारों मामले लंबित हैं, तो इसकी जिम्मेदारी निर्धारित होनी चाहिए। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा विषय है।
उपभोक्ता संरक्षण कानून का उद्देश्य त्वरित, सस्ता और प्रभावी न्याय प्रदान करना था। जब एक दुर्घटना पीड़ित परिवार को एक वर्ष तक केवल अगली सुनवाई की प्रतीक्षा करनी पड़े, तब यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि क्या हम वास्तव में उस उद्देश्य को पूरा कर पा रहे हैं जिसके लिए उपभोक्ता आयोगों की स्थापना की गई थी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत सरकार का उपभोक्ता कार्य मंत्रालय, राज्य सरकारें तथा संबंधित संवैधानिक प्राधिकारी तत्काल रिक्त पदों को भरें, अतिरिक्त पीठों का गठन करें और दुर्घटना एवं बीमा दावों जैसे मामलों के लिए विशेष त्वरित व्यवस्था विकसित करें।
इस विषय में माननीय भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा भारत सरकार के विधि एवं न्याय मंत्रालय का ध्यान आकर्षित करना आवश्यक समझता हूं। यह किसी एक व्यक्ति या एक मुकदमे का प्रश्न नहीं है। यह उन हजारों परिवारों का प्रश्न है जो उपभोक्ता आयोगों से न्याय की अपेक्षा रखते हैं और वर्षों तक केवल अगली तारीख की प्रतीक्षा करते रहते हैं।
न्यायालयों का सम्मान प्रत्येक नागरिक का दायित्व है, किंतु न्यायिक संस्थाओं को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना सरकारों का कर्तव्य है। यदि न्याय पाने में वर्षों लग जाएं, तो जनता का विश्वास कमजोर होना स्वाभाविक है।
न्याय में विलंब केवल प्रशासनिक समस्या नहीं है। अनेक परिस्थितियों में यह न्याय से वंचित किए जाने के समान हो जाता है।