राजनीतिक पसंद-नापसंद का स्तर शायद अपने सबसे बुरे दौर में…

Bueauro,

राजनीतिक पसंद-नापसंद का स्तर शायद अपने सबसे बुरे दौर में… 

राजनीतिक पसंद-नापसंद का स्तर शायद अपने सबसे बुरे दौर में पहुंच चुका है।

वैचारिक और दलगत मतभेद लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया माने जाते हैं, लेकिन आज यह मतभेद बहस और तर्क की बजाय लांछन, चरित्रहनन और दुष्प्रचार तक पहुंच चुके हैं।
मेरी समझ में इस प्रवृत्ति को संगठित रूप से बढ़ावा देने का काम सबसे पहले बीजेपी की आईटी सेल ने किया।

राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ झूठे नैरेटिव गढ़ना, आधी-अधूरी सूचनाओं को वायरल करना और व्यक्तिगत हमले करना एक रणनीति के रूप में सामने आया। उसका दुष्परिणाम आज पूरे राजनीतिक और सामाजिक वातावरण में दिखाई दे रहा है।
कल से फेसबुक पर कुछ कुंठित, दो कौड़ी के आईटी सेलिये ट्रोलर समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव की बिटिया के चरित्रहनन पर उतारू हैं।

उस बच्ची पर ऐसे-ऐसे अनर्गल आरोप लगाए जा रहे हैं जिनका न कोई आधार है और न कोई प्रमाण। आश्चर्य इस बात का है कि ऐसे लोग तनिक भी ग्लानि महसूस नहीं करते कि वह किसका चरित्रहनन कर रहे हैं। जिस लड़की का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं, जो सार्वजनिक जीवन का हिस्सा नहीं है, उसे केवल इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वह एक राजनीतिक व्यक्ति की बेटी है।

दरअसल राजनीतिक मतभेद अब रसातल की ओर बढ़ चुके हैं। असहमति का सम्मान करने की लोकतांत्रिक संस्कृति तेजी से समाप्त होती जा रही है। आज फेसबुक, एक्स और इंस्टाग्राम जैसे मंचों पर असहमति का जवाब तर्क से नहीं बल्कि गाली-गलौज, अपमान और चरित्रहनन से दिया जाता है। किसी के विचार पसंद नहीं आए तो उसके परिवार तक को निशाना बना लिया जाता है। यह प्रवृत्ति केवल राजनीति को नहीं बल्कि पूरे समाज को विषाक्त बना रही है।

स्थिति को और भयावह बनाने का काम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने कर दिया है। एआई ने ट्रोलरों के हाथ में एक नया औजार थमा दिया है। अब किसी की फोटो एडिट करके उसे किसी के साथ जोड़ देना, फर्जी तस्वीरें और वीडियो बनाना बेहद आसान हो गया है। कई बार यह सामग्री इतनी वास्तविक प्रतीत होती है कि आम आदमी सच और झूठ में अंतर ही नहीं कर पाता। यही कारण है कि फेक कंटेंट पहले से कहीं अधिक खतरनाक हो गया है।

इन सब पर लगाम लगाने के लिए सोशल मीडिया कंपनियों को गंभीर कदम उठाने होंगे। फर्जी और भ्रामक सामग्री फैलाने वालों की आईडी तत्काल ब्लॉक होनी चाहिए। फेसबुक, एक्स और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर पहचान सत्यापन की प्रक्रिया और कठोर होनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि किसी अकाउंट के पीछे वास्तविक व्यक्ति कौन है।

क्योंकि अधिकतर ट्रोलर फर्जी आईडी बनाकर, डीपी में देवी-देवता, फूल-पत्ती या अन्य प्रतीकात्मक तस्वीरें लगाकर नफरत फैलाने का काम करते हैं। साथ ही आईटी एक्ट को भी और कठोर बनाने की आवश्यकता है, ताकि कानून का भय पैदा हो और किसी की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ करने से पहले लोग सौ बार सोचें। लोकतंत्र में मतभेद जरूरी हैं, लेकिन मतभेद के नाम पर चरित्रहनन और सामाजिक हिंसा किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकती।

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