नज़र

नज़र

प्रस्तुति:विजय दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार

यह पंक्तियाँ मशहूर शायर और गीतकार जावेद अख्तर की लिखी हुई हैं। यह उनकी बेहद खूबसूरत और जज्बाती नज़्मों में से एक है, जो अक्सर उनके काव्य-संग्रहों और मुशायरों में सुनी जाती है।

मैं भूल जाऊं तुम्हें
अब यही मुनासिब है
मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ
कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो
कोई ख़्वाब नहीं
​यहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँ
कम-बख़्त
भुला न पाया वो सिलसिला
जो था ही नहीं
​वो इक ख़याल
जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात
जो मैं कह नहीं सका तुम से
वो एक रब्त*
जो हम में कभी रहा ही नहीं
​मुझे है याद वो सब
जो कभी हुआ ही नहीं

नज़्म का भावार्थ

​इस नज़्म में कवि उस अधूरेपन और उन खयालों की बात कर रहे हैं जो कभी हकीकत का रूप नहीं ले पाए। सबसे गहरी चोट वह आखिरी पंक्ति करती है— “मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं”। यह उस मानसिक स्थिति को दर्शाता है जहाँ इंसान हकीकत से ज्यादा उन यादों और मुलाकातों में जीता है जो सिर्फ उसके मन में घटित हुई थीं।

शब्दार्थ

​मुनासिब: उचित या सही
​रब्त: संबंध या रिश्ता
​आलम: स्थिति या हाल

यह रूहानी दुनिया में जीने वाले आम इंसान के सपने की कहानी है।

साभार,

विजयकांत दीक्षित

वरिष्ठ पत्रकार

 

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