डिजिटल युग में ‘इतिहास’ की हत्या और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का मायाजाल
विशेष रिपोर्ट: पत्रकारिता विश्लेषण

विजय दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार
(अमृत बाजार पत्रिका/युगान्तर समूह, कोलकाता)
नई दिल्ली। सूचना क्रांति के इस दौर में ‘समाचार’ अब न्यूज़रुम के संपादकीय विवेक से नहीं, बल्कि बंद कमरों में चलने वाले व्हाट्सएप चैनलों और राजनीतिक आईटी सेल्स की प्रयोगशालाओं से तय हो रहे हैं। एक पत्रकार के तौर पर पांच दशक का अनुभव, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया समूह’ और ‘अमृत बाजार पत्रिका/युगान्तर समूह’ जैसी संस्थाओं की विरासत मुझे यह कहने पर मजबूर करती है कि आज हम ‘सूचना के लोकतंत्र’ में नहीं, बल्कि ‘भ्रम के तंत्र’ में जी रहे हैं।
हाल ही में 9 जनवरी 2026 को सोशल मीडिया पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और उनके परिवार को लेकर वायरल हुआ एक वीभत्स संदेश इस गंदे खेल का महज एक हिस्सा है। वह यह दर्शाता है कि कैसे ‘डिजिटल नफरत’ का एल्गोरिदम हमारे इतिहास को निगल रहा है।
तथ्यों की वेदी पर ‘चरित्र हनन’ की राजनीति
सोशल मीडिया पर सक्रिय कई चैनल (जैसे ।।(श्री राधे)।। # सच पर नजर) धार्मिक आस्था की आड़ लेकर इतिहास का गला घोंट रहे हैं। गांधीजी के सबसे बड़े पुत्र हरिलाल गांधी के धर्मांतरण (1936) का सहारा लेकर एक ऐसी अश्लील कहानी गढ़ी गई, जिसका हकीकत से कोई वास्ता नहीं है। दुष्प्रचार करने वालों ने ‘मनु गांधी’ (जो गांधीजी के भतीजे की पुत्री थीं) को हरिलाल की पुत्री बताकर पेश किया, जबकि हरिलाल की अपनी पुत्री का नाम ‘रामी’ था। यह अज्ञानता नहीं, बल्कि ‘कैरेक्टर असिनेशन’ (चरित्र हनन) की एक सोची-समझी रणनीति है।
फेक न्यूज’ का प्रहार,नेहरू से लेकर मोदी तक
चरित्र हनन का यह सिलसिला केवल गांधीजी तक सीमित नहीं है। आज हर विचारधारा के महापुरुषों को ‘डिजिटल डस्टबिन’ में धकेलने की कोशिश हो रही है:
जवाहरलाल नेहरू: देश के पहले प्रधानमंत्री की वंशावली, उनके व्यक्तिगत रहन-सहन और उनके चरित्र को लेकर सबसे ज्यादा अश्लील और मनगढ़ंत सामग्री व्हाट्सएप पर प्रसारित की जाती है। उनके ऐतिहासिक योगदान को नकारने के लिए तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ कर उन्हें ‘महिला-विरोधी’ दिखाने के घृणित प्रयास होते हैं।
लाल बहादुर शास्त्री: शास्त्री जी की सादगी और उनकी रहस्यमयी मृत्यु को लेकर अक्सर नेहरू या अन्य नेताओं के खिलाफ फर्जी षड्यंत्रकारी कहानियां गढ़ी जाती हैं, ताकि दो महापुरुषों की स्मृतियों को आपस में लड़ाया जा सके।
अटल बिहारी वाजपेयी: उदारवादी और सर्वमान्य नेता अटल जी के पुराने बयानों को काट-छाँट कर उन्हें या तो बहुत कट्टर या बहुत कमजोर दिखाने की कोशिश की जाती है, ताकि वर्तमान राजनीति की जरूरतों को पूरा किया जा सके।
*नरेंद्र मोदी*: वर्तमान प्रधानमंत्री के संदर्भ में भी झूठ का बाजार गर्म रहता है। कभी उनके बचपन की मनगढ़ंत कहानियां, तो कभी उनके भाषणों के ‘डॉक्टर्ड वीडियो’ (एडिट किए हुए वीडियो) के जरिए उनके व्यक्तित्व को या तो अति-मानवीय या अत्यंत नकारात्मक दिखाने का प्रयास किया जाता है।
एल्गोरिदम चाल*: *सच सोता है, झूठ दौड़ता है
फेसबुक, व्हाट्सएप और टेलीग्राम के एल्गोरिदम सत्य नहीं, बल्कि ‘एंगेजमेंट’ पर चलते हैं। ‘घृणा’ और ‘क्रोध’ सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया पैदा करने वाले भाव हैं, इसलिए नफरत फैलाने वाले संदेश उन सूचनाओं की तुलना में 70% तेजी से फैलते हैं जो तथ्यात्मक होती हैं। पाठक को एक ‘इको चैंबर’ में कैद कर दिया जाता है, जहाँ उसे बार-बार एक ही तरह का झूठ परोसा जाता है, जब तक कि वह उसे शाश्वत सत्य न मान ले।
राजनीतिक दलों का प्रोपेगैंडा इकोसिस्टम
भारत में सक्रिय व्हाट्सएप चैनलों को उनके राजनीतिक झुकाव के आधार पर तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
1.दक्षिणपंथी झुकाव: यहाँ मुख्य हथियार ‘गुमनाम इतिहास’ है, जिसका उद्देश्य नेहरू-गांधी परिवार की छवि को धूमिल करना है।
2.,वाम-उदारवादी झुकाव: यहाँ ‘संविधान’ और ‘लोकतंत्र’ के नाम पर भय का माहौल बनाया जाता है और अक्सर सरकारी आंकड़ों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है।
3.जातिगत समूह: ये समूह विशिष्ट जातियों को ‘पीड़ित’ या ‘योद्धा’ के रूप में पेश कर राजनीतिक गोलबंदी करते हैं।
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के जाल से कैसे बचें?
(वरिष्ठ पत्रकार विजय दीक्षित की ५ सूत्रीय सलाह)
स्रोत की जांच: यदि संदेश “Forwarded many times” है, तो उस पर तुरंत विश्वास न करें।
गूगल लेंस/रिवर्स इमेज सर्च: किसी भी फोटो की असलियत जानने के लिए उसे गूगल पर सर्च करें।
तारीख और संदर्भ: ऐतिहासिक पात्रों के नामों की स्पेलिंग और तारीखों का मिलान विश्वसनीय स्रोतों से करें।
फैक्ट-चेक वेबसाइट्स: PIB Fact Check, Boom Live या Alt News जैसी वेबसाइट्स की मदद लें।
भाषा की पहचान: यदि संदेश में बहुत ज्यादा इमोजी और आक्रामक भाषा है, तो वह ‘सूचना’ नहीं, बल्कि ‘राजनीतिक वायरस’ है।
निष्कर्ष: पत्रकारिता का धर्म
एक वरिष्ठ पत्रकार के नाते मेरा मानना है कि इतिहास के पात्रों की आलोचना उनके राजनीतिक निर्णयों के आधार पर होनी चाहिए, न कि व्हाट्सएप पर गढ़ी गई अश्लील कहानियों के आधार पर। जब ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ के स्नातक समाज की दिशा तय करने लगें, तो मुख्यधारा की पत्रकारिता की जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
संपर्क: विजय दीक्षित
वरिष्ठ पत्रकार, अमृत बाजार पत्रिका/युगान्तर समूह
ईमेल: vijay.nbt@gmail.com
मोबाइल: +91-9415016082
साभार विजय कांत दीक्षित