नई पीढ़ी अपने तरीके से ढूंढ रही है भगवान को
नितिन त्रिपाठी
तुलसी अपने राम को रीझ भजो या खीझ,
भूमि परे उपजांएगें उल्टे सीधे बीज।
इन दिनों भारतीय महानगरों और बड़े शहरों में एक नया ट्रेंड तेज़ी से वायरल हो रहा है—टेक्नो भजन या भजन क्लबिंग। क्लब में तेज़ बीट्स, लेकिन बोल “हरे कृष्ण”, “राम नाम”, “शिवाय नमः”। शराब नहीं, बल्कि चाय। सिगरेट नहीं, बल्कि चंदन और अगरबत्ती की खुशबू। डीजे के सामने हाथ हवा में नहीं, आँखें बंद करके झूमते युवा। पहली नज़र में यह विरोधाभास लगता है, लेकिन यही आज की पीढ़ी की सच्चाई है।
असल में यह कोई अचानक पैदा हुआ ट्रेंड नहीं है। इसकी जड़ें गोवा और ऋषिकेश की ecstatic dance पार्टियों में मिलती हैं, जहाँ विदेशी युवा ध्यान, मंत्र और संगीत को नशे के बिना महसूस करने लगे। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय युवा भी भजन, कीर्तन और मंत्रों की ओर लौटे—लेकिन अपने तरीके से। पुराने ढर्रे के भजन नहीं, बल्कि हाई-एनर्जी टेक्नो बीट्स पर रिमिक्स। वही शब्द, वही भाव, बस अभिव्यक्ति नई।
फेसबुक जनरेशन और शुद्धतावादियों के लिए यह झटका हो सकता है। “भजन क्लब में?”, “धर्म का मज़ाक?”—ऐसी प्रतिक्रियाएँ आना तय है। सच कहूँ तो मैं भी तय नहीं कर पाया कि इसे सराहा जाए या आलोचना की जाए। लेकिन उम्र और अनुभव ने इतना सिखा दिया है कि हर पीढ़ी ईश्वर को अपने तरीके से खोजती है। कोई मंदिर में, कोई किताब में, और कोई डांस फ्लोर पर।
पसंद करें या न करें, एक बात साफ़ है—यह ट्रेंड आया नहीं है, आ चुका है। यह न भक्ति का अंत है, न संस्कृति का पतन। यह बस एक संकेत है कि युवा पीढ़ी न तो धर्म छोड़ रही है, न ही पूरी तरह पश्चिमी बन रही है। वह अपने ही सवालों के जवाब अपने ही तरीकों से ढूँढ रही है। शायद यही हर युग की पहचान होती है—पुराने भाव, नए रूप में।