लखनऊ अग्निकांड—हादसे, जवाबदेही और ‘लीपापोती’ का पुराना खेल

लखनऊ अग्निकांड—हादसे, जवाबदेही और ‘लीपापोती’ का पुराना खेल

आलोक वर्मा संवाददाता।

लखनऊ में हुआ हालिया अग्निकांड एक बार फिर देश के शहरी नियोजन, सुरक्षा मानकों और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गहरा तमाचा है। लेकिन इस त्रासदी के बाद जो प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया देखने को मिल रही है, वह एक पुरानी और घिसी-पिटी पटकथा जैसी है। हादसा होते ही पुलिस हरकत में आती है, इमारत के मालिकों की तलाश शुरू होती है, उन्हें मुख्य विलेन के रूप में पेश किया जाता है, और जनता के आक्रोश को चतुराई से एक खास दिशा में मोड़ दिया जाता है।
बेशक, अवैध निर्माण करने वाले और सुरक्षा मानकों को ताक पर रखने वाले भवन मालिक सख्त से सख्त सजा के हकदार हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ मालिकों को जेल भेज देने से व्यवस्था सुधर जाएगी? या यह सिर्फ एक प्रशासनिक चालाकी है, जिसका मकसद असली चेहरों को बचाना और मामले पर लीपापोती करना है?
कड़वा सच यह है कि कोई भी अवैध इमारत या असुरक्षित परिसर रातों-रात खड़ा नहीं होता। वह भ्रष्ट तंत्र, रसूख और सांठगांठ की मजबूत नींव पर खड़ा होता है।
जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता, तब तक इन इमारतों में चल रही चार सौ बीसी और नियमों का उल्लंघन हर उस अधिकारी को दिखाई देता है, जिसकी जिम्मेदारी इसे रोकने की है। लेकिन तब कार्रवाई के बजाय महीने की घूस और सुविधा शुल्क का खेल चलता है। एलडीए, नगर निगम, अग्निशमन विभाग और स्थानीय पुलिस की नाक के नीचे सालों-साल मौत के ये कुएं चलते रहते हैं, और जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदकर अपनी जेबें भरते रहते हैं।
जनता यह पूछने का हक रखती है कि जो अधिकारी सालों तक इन अवैध निर्माणों को संरक्षण देते रहे, क्या वे इस कत्ल के सह-आरोपी नहीं हैं? क्या उन विभागों के प्रमुखों पर कार्रवाई नहीं होनी चाहिए जिन्होंने फाइलों को दबाकर रखा? सिर्फ हादसे के बाद ही क्यों जागता है प्रशासन?
अगर हम वाकई चाहते हैं कि भविष्य में ऐसे अग्निकांड न हों, तो सजा का दायरा केवल बिल्डिंग मालिकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सजा की आंच उस भ्रष्ट सरकारी तंत्र तक भी पहुंचनी चाहिए जिसने चंद पैसों के लिए इंसानी जिंदगियों का सौदा कर दिया। जब तक रिश्वतखोर और लापरवाह अधिकारियों को नौकरी से बर्खास्त कर जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाएगा, तब तक यह खूनी सिलसिला थमेगा नहीं।
सिर्फ मालिकों को विलेन बनाकर जनता के गुस्से को शांत कर देना न्याय नहीं, बल्कि न्याय का ढोंग है। अब वक्त आ गया है कि इस सांठगांठ को तोड़ा जाए और उस सिस्टम को कटघरे में खड़ा किया जाए, जिसकी सरपरस्ती में आम नागरिक रोज मौत के साए में जीने और मरने को मजबूर है।

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