आईजीआरएस पोर्टल पर फाइलों में मुस्कुराती जनता, हकीकत में दफ्तरों के चक्कर काटती जिंदगी

आलोक वर्मा जौनपुर संवाददाता

आईजीआरएस पोर्टल पर फाइलों में मुस्कुराती जनता, हकीकत में दफ्तरों के चक्कर काटती जिंदगी

जौनपुर।
उत्तर प्रदेश सरकार का सबसे महत्वाकांक्षी विंग आईजीआरएस यानी जनसुनवाई पोर्टल जौनपुर में सरकारी बाबूगिरी और अफसरों की घोर लापरवाही की भेंट चढ़ चुका है। कहने को तो जिलाधिकारी सैमुअल पॉल एन. ने कलेक्ट्रेट सभागार में बैठक कर कड़ी नाराजगी जताई और सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी, लेकिन धरातल की कड़वी सच्चाई यह है कि जिला प्रशासन के कई अहम विभाग इस पूरे सिस्टम को मज़ाक समझकर बैठे हैं।
सरकारी दफ्तरों में जनता की शिकायतों का समाधान नहीं, बल्कि सिर्फ निस्तारण हो रहा है और इन दोनों शब्दों के बीच का फर्क जौनपुर की पीड़ित जनता अपने आंसुओं से लिख रही है।
इन विभागों ने ढीठता की पार की हदें
समीक्षा बैठक में जिन विभागों की सबसे ज्यादा किरकिरी हुई और जिन पर जिलाधिकारी का चाबुक चला, वे सीधे तौर पर जनसामान्य के जीवन से जुड़े हैं।
लोक निर्माण विभाग प्रांतीय खंड की लापरवाही जगजाहिर है जहां सड़कें गड्ढामुक्त हों या न हों, इनकी लापरवाही की फाइलें पूरी तरह से चकाचक हैं। स्वास्थ्य विभाग यानी मुख्य चिकित्सा अधिकारी का कार्यालय आम जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने का दावा तो करता है, लेकिन खुद आईजीआरएस की बीमारी से ग्रसित है। जल निगम ग्रामीण के हाल यह हैं कि हर घर जल की योजना कागजों पर बह रही है, और जनता पानी की बूंद-बूंद और लीकेज की शिकायतें लेकर पोर्टल पर भटक रही है।
बिजली, पुलिस और समाज कल्याण में मची है खुली मनमानी
जिलाधिकारी की बैठक से इतर जमीनी हकीकत यह है कि बिजली विभाग तो आईजीआरएस पोर्टल को बुरी तरह से इग्नोर कर रहा है। बिजली विभाग के अधिकारी और कर्मचारी लगातार गलत रिपोर्ट लगा रहे हैं, जिसकी त्वरित जांच किया जाना बेहद जरूरी हो चुका है।
यही हाल समाज कल्याण विभाग और जिला दिव्यांगजन कल्याण विभाग का भी है, जहां पात्रों की मदद करने के बजाय मनमानी तरीके से गलत रिपोर्ट लगाकर फाइलों को डंप किया जा रहा है।
सबसे बदतर स्थिति पुलिस विभाग की सामने आई है, जहां कानून के रखवाले ही नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। अभी हाल ही में पुलिस विभाग द्वारा सुप्रीम कोर्ट की सख्त गाइडलाइन को सरेआम इग्नोर करने का एक गंभीर मामला प्रकाश में आया है। घरेलू हिंसा एक्ट जैसे संवेदनशील मामलों में भी मुकदमा दर्ज करने के बजाय पुलिस लगातार हीलाहवाली कर रही है और पीड़ितों को न्याय देने के बजाय पोर्टल पर फर्जी आख्याएं लगा रही है।
सिर्फ कागजी क्लोजर रिपोर्ट का खेल: बिना राहत दिए बंद हो रहे मामले
आखिर आईजीआरएस पर जौनपुर की रैंकिंग और दावों की हवा क्यों निकल रही है? इसके पीछे अधिकारियों और कर्मचारियों का एक शातिर सिंडिकेट काम कर रहा है।
कड़वा सच यह है कि पोर्टल पर शिकायत दर्ज होते ही धरातल पर जांच करने के बजाय, बंद कमरों में बैठकर गलत निस्तारण कर दिया जाता है। शिकायतकर्ता को कोई राहत नहीं मिलती, उसकी समस्या जस की तस बनी रहती है, लेकिन सिस्टम में क्लोजर रिपोर्ट लगाकर फाइल बंद कर दी जाती है। यह सीधे तौर पर जनता और सूबे के मुखिया, दोनों की आंखों में धूल झोंकने जैसा है।
नियमों की अज्ञानता या जानबूझकर की जा रही गलत व्याख्या
इस बदहाली की एक बड़ी वजह सरकारी महकमों में बैठे निचले स्तर के कर्मचारियों की अयोग्यता और घमंड है। सूत्रों की मानें तो शिकायत निस्तारण में लगे कई कर्मचारियों को नियमों और कानून की बुनियादी जानकारी तक नहीं है। अपनी कमियों को छिपाने के लिए ये कर्मचारी शासनादेशों और नियमों की गलत व्याख्या करते हैं। एल 1, एल 2, एल 3 और एल 4 स्तर के अधिकारी आंख मूंदकर फाइलों पर दस्तखत कर रहे हैं, जिससे जनता को नकारात्मक फीडबैक देने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
डीएम की चेतावनी: सिर्फ घुड़की या होगा कोई बड़ा एक्शन
जिलाधिकारी सैमुअल पॉल एन. ने साफ कहा है कि आईजीआरएस केवल कागजी औपचारिकता न बने, बल्कि वास्तविक समाधान दिखे। उन्होंने भविष्य में सीधे निलंबन और कठोर विभागीय कार्रवाई की चेतावनी दी है। बैठक में मुख्य राजस्व अधिकारी अजय अंबष्ठ और एडीएम वित्त एवं राजस्व परमानंद झा की मौजूदगी में अफसरों को कड़ा पाठ तो पढ़ाया गया, लेकिन सवाल वही है।
हमारा तीखा सवाल:
क्या जिलाधिकारी की इस सख्ती के बाद जौनपुर के भ्रष्ट, सुस्त और मनमानी कर रहे बिजली तथा पुलिस महकमे के अधिकारी अपनी कुर्सी से उठकर जमीन पर जाएंगे? या फिर कुछ दिनों की शांति के बाद, कागजी क्लोजर रिपोर्ट का यह खेल दोबारा शुरू हो जाएगा? जनता अब खोखले आश्वासनों से थक चुकी है; उसे पोर्टल पर रिजॉल्व्ड का स्टेटस नहीं, जमीन पर समाधान चाहिए।

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