आलोक वर्मा जौनपुर ब्यूरो,
जौनपुर में जनता दर्शन व्यवस्था पर सवाल, विकलांग वृद्धा दो दिनों से भटकने को मजबूर
जौनपुर। शासन की मंशा के अनुरूप आम जनता की समस्याओं के त्वरित निस्तारण के लिए अधिकारियों को नियमित रूप से कार्यालय में बैठकर जनता की शिकायतें सुनने के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन जौनपुर तहसील सदर में इसका पालन होता नहीं दिख रहा है। उपजिलाधिकारी सदर कार्यालय की कार्यप्रणाली पर उस समय गंभीर सवाल खड़े हो गए जब 70 वर्षीय विकलांग वृद्धा रन्नो वर्मा लगातार दो दिनों से अपना प्रार्थना पत्र जमा कराने के लिए परेशान होती रहीं, लेकिन उन्हें सुनने वाला कोई नहीं मिला।
एसडीएम सदर कार्यालय पर नहीं मिले अधिकारी
जानकारी के अनुसार वृद्धा रन्नो वर्मा वरिष्ठ नागरिक अधिनियम एवं भरण-पोषण अधिनियम के अंतर्गत अपना आवेदन अपने भतीजे के माध्यम से उपजिलाधिकारी सदर को देना चाह रही थीं। आरोप है कि दो दिनों से तहसील के चक्कर लगाने के बावजूद उपजिलाधिकारी सदर संतबीर सिंह कार्यालय में मौजूद नहीं मिले, जिसके कारण आवेदन जमा नहीं हो सका।
तहसील परिसर में जनता दर्शन के लिए सुबह 9 बजे से 11 बजे तक का बोर्ड लगा हुआ है, लेकिन पीड़ित पक्ष का आरोप है कि निर्धारित समय पर भी अधिकारी कार्यालय में उपस्थित नहीं रहते। इससे आम जनता, विशेषकर बुजुर्ग, दिव्यांग एवं असहाय लोगों को भारी परेशानी उठानी पड़ रही है।
शासनादेश का खुला उल्लंघन
प्रदेश सरकार लगातार अधिकारियों को जनता की समस्याओं के प्रति संवेदनशील रहने और नियमित जनसुनवाई करने के निर्देश देती रही है। जिलाधिकारी द्वारा भी समय-समय पर सख्ती बरतने की बात कही जाती रही है, लेकिन तहसील स्तर पर उसका असर दिखाई नहीं दे रहा। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि एक विकलांग वृद्धा को अपना आवेदन देने के लिए दो-दो दिन भटकना पड़े तो आम जनता की समस्याओं के समाधान की स्थिति सहज ही समझी जा सकती है।
वरिष्ठ नागरिक को नहीं मिल रहा न्याय
रन्नो वर्मा का मामला वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों एवं भरण-पोषण से जुड़ा बताया जा रहा है। वृद्धा की उम्र अधिक होने के साथ-साथ वह शारीरिक रूप से भी कमजोर हैं, इसके बावजूद उन्हें बार-बार तहसील के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। इससे प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
स्थानीय लोगों ने मांग की है कि मामले का संज्ञान लेकर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए तथा यह सुनिश्चित किया जाए कि जनता दर्शन केवल बोर्ड तक सीमित न रह जाए, बल्कि आम नागरिकों को वास्तव में राहत मिल सके।