नीट पेपर लीक मामले में बड़े राजनीतिज्ञों की खामोशी क्यों?

Alok Verma, Jaunpur Bueauro,

नीट पेपर लीक मामले में बड़े राजनीतिज्ञों की खामोशी क्यों?

देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा मानी जाने वाली NEET परीक्षा के पेपर लीक प्रकरण ने लाखों छात्रों और अभिभावकों के मन में गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परीक्षा की पारदर्शिता, एजेंसियों की विश्वसनीयता और शिक्षा व्यवस्था की निष्पक्षता पर बहस तेज हुई, लेकिन इस पूरे विवाद के बीच देश के कई बड़े राजनीतिज्ञों की अपेक्षाकृत सीमित प्रतिक्रिया ने भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा पैदा कर दी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मुद्दे पर नेताओं की खामोशी के पीछे कई कारण हो सकते हैं। पहला कारण यह माना जा रहा है कि नीट जैसी परीक्षा सीधे करोड़ों युवाओं की भावनाओं से जुड़ी है और किसी भी राजनीतिक बयान का व्यापक असर हो सकता है। इसलिए कई दल पूरी जानकारी और जांच रिपोर्ट आने तक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।

दूसरा बड़ा कारण केंद्र और राज्यों के बीच जिम्मेदारी को लेकर राजनीतिक संतुलन माना जा रहा है। परीक्षा संचालन से जुड़े संस्थानों, एजेंसियों और राज्य स्तर पर सक्रिय कथित गिरोहों के तार कई राज्यों तक बताए गए। ऐसे में कोई भी दल खुलकर आक्रामक राजनीति करने से पहले राजनीतिक नुकसान-फायदे का आकलन कर रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार शिक्षा अब केवल सामाजिक विषय नहीं बल्कि बड़ा आर्थिक क्षेत्र बन चुकी है। कोचिंग उद्योग, प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था और निजी संस्थानों की बढ़ती भूमिका ने इस पूरे तंत्र को अत्यंत प्रभावशाली बना दिया है। ऐसे में राजनीतिक दल कई बार इस प्रकार के मामलों पर सीमित प्रतिक्रिया देकर संतुलन बनाए रखने की कोशिश करते हैं।

युवा वर्ग के बीच यह धारणा भी मजबूत हुई है कि जब किसानों, जातीय समीकरणों या चुनावी मुद्दों पर तुरंत राजनीतिक बयान आते हैं, तब शिक्षा और रोजगार जैसे प्रश्नों पर वैसी आक्रामकता अक्सर दिखाई नहीं देती। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर छात्रों द्वारा “भविष्य बनाम राजनीति” की बहस लगातार चल रही है।

हालांकि कुछ विपक्षी दलों ने मामले की उच्चस्तरीय जांच, परीक्षा रद्द करने और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की, वहीं सत्ता पक्ष ने इसे गंभीर अपराध बताते हुए जांच एजेंसियों की कार्रवाई और सख्त कदमों पर जोर दिया। लेकिन जनता के एक बड़े वर्ग को अब भी शीर्ष स्तर से अधिक स्पष्ट और कठोर राजनीतिक संदेश की अपेक्षा है।

समाजशास्त्रियों का कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार सामने आने वाले पेपर लीक मामलों ने युवाओं के भीतर असुरक्षा और अविश्वास की भावना पैदा की है। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत और आर्थिक दबाव के बीच तैयारी करते हैं। ऐसे में यदि परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठते हैं तो उसका असर केवल परिणामों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यवस्था पर भरोसे को भी कमजोर करता है।

राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो आने वाले समय में शिक्षा, भर्ती और परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकती है। जिस देश की सबसे बड़ी आबादी युवा हो, वहां युवाओं के भविष्य से जुड़े प्रश्नों पर राजनीतिक खामोशी लंबे समय तक टिक पाना आसान नहीं माना जा रहा।

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