आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,
फिर दागदार हुआ नीट
नई दिल्ली/रायपुर (13 मई, 2026): नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा NEET (UG) 2026 परीक्षा को रद्द किए जाने के बाद देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा एक बार फिर बड़े विवाद के घेरे में है। राजस्थान और बिहार में परीक्षा से ठीक पहले प्रश्नपत्र व्हाट्सएप पर प्रसारित होने के पुख्ता प्रमाण मिलने के बाद शिक्षा मंत्रालय ने मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी है। 2024 के बाद यह दूसरा अवसर है जब परीक्षा की शुचिता भंग होने के कारण इसे निरस्त करना पड़ा है।
इस प्रशासनिक विफलता के बीच 2024 के NEET विवाद के समय NTA के महानिदेशक (DG) रहे सुबोध कुमार सिंह (IAS) की वर्तमान भूमिका को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में तीखी बहस छिड़ गई है।
CBI की शुरुआती FIR: बड़े खुलासे
शिक्षा मंत्रालय की लिखित शिकायत पर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने आधिकारिक FIR दर्ज कर देशव्यापी जांच शुरू कर दी है। सीबीआई ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024 के तहत मामला दर्ज किया है।
मूल साजिश: शुरुआती जांच के अनुसार, यह लीक एक अंतर-राज्यीय सिंडिकेट द्वारा अंजाम दिया गया है, जिसके तार केरल, महाराष्ट्र और राजस्थान से जुड़े हैं। नासिक से एक मुख्य संदिग्ध को हिरासत में लिया गया है।
‘गेस पेपर’ का खेल: परीक्षा से पहले व्हाट्सएप और टेलीग्राम ग्रुप्स पर एक “गेस पेपर” लीक किया गया था। इस पर्चे में करीब 410 प्रश्न थे, जिनमें से 120 प्रश्न (यानी कुल 720 में से लगभग 600 अंक के सवाल) असली परीक्षा के प्रश्नपत्र से हूबहू मेल खा गए।
लाखों की डीलिंग: यह पेपर छात्रों और कोचिंग माफियाओं को परीक्षा की रात ₹30,000 से लेकर ₹5 लाख तक में बेचा गया था। राजस्थान पुलिस की स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) ने इस सिलसिले में अब तक 45 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया है।
विपक्ष के कड़े तेवर: शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग
परीक्षा रद्द होने के बाद कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार और NTA के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
छात्रों के भविष्य से खिलवाड़: विपक्ष ने आरोप लगाया कि 22 लाख से अधिक छात्रों का भविष्य अब इस अक्षम प्रणाली के कारण अंधकार में है। विपक्षी नेताओं ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और पूरे मामले की न्यायिक जांच (Judicial Probe) कराने की मांग की है।
सुबोध कुमार सिंह की नियुक्ति पर घेराव: विपक्ष ने पूर्व NTA महानिदेशक सुबोध कुमार सिंह के प्रशासनिक पुनर्वास को मुख्य मुद्दा बनाया है। विपक्ष का कहना है, “जिस अधिकारी के कार्यकाल में 2024 में देश का सबसे बड़ा पेपर लीक घोटाला हुआ, उसे ब्लैकलिस्ट करने के बजाय छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री का प्रधान सचिव [ऊर्जा विभाग प्रमुख] जैसी मलाईदार पोस्टिंग क्यों दी गई?” विपक्ष ने इसे जवाबदेही से भागने और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का उदाहरण बताया है।
पूर्व NTA चीफ पर प्रशासनिक विरोधाभास: क्यों मिला पद?
प्रशासनिक स्तर पर यह बहस तेज है कि क्या सुबोध कुमार सिंह को छत्तीसगढ़ में यह पद मिलना केवल एक ‘तकनीकी प्रक्रिया’ थी या राजनीतिक संरक्षण।
कैडर नियमों की आड़: सरकारी सूत्रों के अनुसार, 1997 बैच के वरिष्ठ IAS अधिकारी होने के नाते, केंद्र से मूल कैडर (छत्तीसगढ़) वापसी पर उन्हें वरिष्ठता के अनुसार प्रधान सचिव स्तर का पद मिलना तय था।
नैतिकता पर सवाल हालांकि, प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि उन्हें सीधे मुख्यमंत्री का प्रधान सचिव बनाना पूरी तरह से राज्य सरकार का रणनीतिक राजनीतिक निर्णय (Discretionary Power) है। परीक्षा प्रणाली ध्वस्त करने वाले चेहरे को इतने संवेदनशील पद पर बिठाने से जनता और छात्रों के बीच व्यवस्था के प्रति अविश्वास और गहरा गया है।
CBI की पांच विशेष टीमें इस समय राजस्थान और महाराष्ट्र में ताबड़तोड़ छापेमारी कर रही हैं। जहाँ एक ओर जांच एजेंसी अपराधियों को पकड़ने में जुटी है, वहीं दूसरी ओर सरकार को परीक्षा की गोपनीयता सुनिश्चित करने और दागी अधिकारियों को संरक्षण न देने के मोर्चे पर कड़े सवालों का सामना करना पड़ रहा है।