ब्यूरो,
जिस तरह से बसपा नेताओं की जननी रही है उसी तरह से आम आदमी पार्टी भी हो गई है।
इन दोनों पार्टियों के नेताओं की बीजेपी में बहुत पूछ है वहीं बीजेपी के वरिष्ठ कार्यकर्ता जिंदगी भर दरी बिछाने का काम करते रहते हैं और बसपा आम आदमी पार्टी से आयातित नेता विधायक सांसद मंत्री बनकर ऐश करते हैं और पार्टी को रसातल में लो जाते हैं क्योंकि ये आयातित नेता आरएसएस की विचारधारा से नहीं होते हैं।
राजरंग
सत्ता की खुमारी में चाशनी में डूबे हुए उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ता बंगाल के कार्यकर्ताओं से लें सबक।
पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहते हुए भी संगठन को मजबूत किया।
वहां के कार्यकर्ता लगातार राजनीतिक दबाव और कठिन परिस्थितियों के बीच भी सक्रिय रहे और जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ बनाए रखी।
तृणमूल कांग्रेस के शासन में कई बार कार्यकर्ताओं पर हमलों की खबरें सामने आईं, इसके बावजूद संगठन ने अपना विस्तार जारी रखा।
बंगाल में बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता ने चुनावों में पार्टी के वोट प्रतिशत को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिम बंगाल में 18 सीटें जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की थी।
यह सफलता वहां के जमीनी कार्यकर्ताओं के निरंतर संघर्ष और मेहनत का परिणाम मानी गई।
इसके विपरीत उत्तर प्रदेश में सत्ता में रहने के कारण कई स्थानों पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता में कमी देखी जाती है।
सरकारी योजनाएं चल रही हैं, लेकिन स्थानीय समस्याओं को लेकर अपेक्षित दबाव नहीं बन रहा है।
संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाए रखना कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है।
बंगाल के कार्यकर्ता स्थानीय मुद्दों को लेकर धरना, प्रदर्शन और जनसंपर्क करते रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में भी बिजली, पानी, रोजगार और प्रशासनिक समस्याएं मौजूद हैं, जिन पर निरंतर आवाज उठाने की जरूरत है।
सिर्फ सत्ता का लाभ लेना और जनता से दूरी बनाना संगठन के दीर्घकालिक हित में नहीं होता।
राजनीतिक दलों की मजबूती उनके कार्यकर्ताओं की सक्रियता और विश्वसनीयता पर निर्भर करती है।
बंगाल में कार्यकर्ताओं ने विपरीत परिस्थितियों में भी संगठन विस्तार का उदाहरण प्रस्तुत किया है।
उत्तर प्रदेश में संसाधनों और सत्ता के बावजूद यदि जमीनी पकड़ कमजोर होती है तो यह चिंता का विषय है।
कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वे जनता के बीच रहकर उनकी समस्याओं को प्राथमिकता दें।
संगठन की मजबूती केवल चुनावी जीत से नहीं बल्कि निरंतर जनसेवा से तय होती है।
बंगाल का अनुभव दिखाता है कि संघर्षशील कार्यकर्ता ही संगठन की असली ताकत होते हैं।
इसलिए उत्तर प्रदेश के कार्यकर्ताओं को भी जमीनी सक्रियता और जनसंपर्क को प्राथमिकता देनी चाहिए।