Alok Verma, Jaunpur Bueauro,
जौनपुर नगर पालिका परिषद में अनियमितताओं पर घिरा सवालों का नया तूफान
अध्यक्ष मनोरमा मौर्या और अधिशासी अधिकारी पवन कुमार पर गंभीर आरोप, पारदर्शिता पर उठी बहस
जौनपुर नगर पालिका परिषद पिछले एक वर्ष से लगातार चर्चाओं और सवालों के घेरे में है। नगर के कई सभासदों, स्थानीय सामाजिक संगठनों और नागरिक मंचों ने परिषद के कार्यों पर गहरी आपत्ति जताई है। आरोपों का केंद्र अध्यक्ष मनोरमा मौर्या और अधिशासी अधिकारी पवन कुमार हैं, जिन पर नगर विकास से जुड़े कई मामलों में अनियमितताओं, मनमानी और जवाबदेही से बचने का आरोप लगाया जा रहा है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इन घटनाओं ने न केवल नगर प्रशासन की छवि खराब की है, बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जीरो टॉलरेंस वाली छवि को भी धूमिल करने का काम किया है।
शिकायतों की शुरुआत उस समय तेज हुई जब नगर पालिका बोर्ड की बैठक में कई सभासदों ने खुले तौर पर कहा कि एक वर्ष में करोड़ों रुपये के कार्य बिना टेंडर की प्रक्रिया अपनाए कराए गए। आरोप है कि कई ऐसे कार्य फाइलों में दर्ज हैं जिनकी न तो सार्वजनिक सूचना जारी की गई और न ही प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया को अपनाया गया। सभासदों का कहना है कि यह शासन के वित्तीय नियमों और सरकार की पारदर्शिता नीति का खुला उल्लंघन है।
डीजल खर्च का मामला भी पूरे विवाद में एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है। सभासदों ने रिकॉर्ड पेश करते हुए दावा किया कि महज छह महीनों में करीब दो करोड़ रुपये का डीजल खर्च दिखाया गया है, जबकि नगर में न तो कूड़ा संग्रहण की गाड़ियों की संख्या में इतनी वृद्धि हुई है और न ही किसी अन्य नए प्रोजेक्ट में ऐसा कोई बदलाव हुआ है जिससे इतना अधिक ईंधन खर्च तर्कसंगत लगे। कई सभासदों का आरोप है कि यह आंकड़ा वास्तविकता से मेल नहीं खाता और इसकी जांच आवश्यक है।
अध्यक्ष मनोरमा मौर्या पर आरोप है कि उन्होंने कई विकास कार्यों की स्वीकृति में पारदर्शिता नहीं बरती। सभासदों का कहना है कि परिषद की समितियों और बोर्ड को दरकिनार कर फैसले लिए गए और कई कार्य ऐसे हैं जिन पर परिषद की औपचारिक स्वीकृति तक नहीं ली गई। सवाल यह भी उठता है कि परिषद की बैठकों में उठे मुद्दों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया और फाइलें महीनों तक ठंडे बस्ते में क्यों पड़ी रहीं।
अधिशासी अधिकारी पवन कुमार पर भी कई शिकायतें दर्ज कराई गई हैं। नागरिक समूहों का कहना है कि नगर की सफाई व्यवस्था, स्ट्रीट लाइट, नाले, सड़क मरम्मत और अन्य मूलभूत सेवाएं लगातार बिगड़ती चली गईं लेकिन विभाग द्वारा न तो नियमित निरीक्षण हुआ और न ही सुधार की कोई स्पष्ट योजना सामने आई। आरोप यह भी है कि परिषद में काम कर रहे कर्मचारियों ने कई बार शिकायत की कि फंड और सामग्री की आपूर्ति में अनियमितता है और भुगतान प्रक्रिया अस्पष्ट है।
सफाई व्यवस्था पर विशेष रूप से सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि रिकॉर्ड में अनेक वार्डों में सफाई कर्मियों की तैनाती दिखाई गई है, लेकिन मौके पर स्थिति इसके बिल्कुल उलट है। कुछ सभासदों ने दावा किया कि कई बार फाइलों में दिखाई गई मशीनें और वाहन जमीनी स्तर पर मौजूद ही नहीं थे। इसी आधार पर अधिशासी अधिकारी की भूमिका पर सवाल खड़े किए गए हैं और जांच की मांग उठी है।
शहर के कई कारोबारी संगठन भी इस पूरे प्रकरण पर आवाज उठा चुके हैं। उनका कहना है कि नगर में स्थायी विकास योजनाओं को प्राथमिकता नहीं दी गई और केवल कागजी कार्यवाही के माध्यम से फंड का उपयोग किया गया। व्यापारियों का आरोप है कि सड़क निर्माण और मरम्मत के कामों में मानक गुणवत्ता नहीं अपनाई गई और महीनों के भीतर ही नए बने सड़कें उखड़ने लगीं। इससे नगर की छवि और व्यापारिक गतिविधियों पर सीधा असर पड़ा।
शिकायतकर्ताओं का यह भी कहना है कि यदि परिषद की नीतियां पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा पर आधारित होतीं तो नगर विकास के परिणाम अधिक बेहतर दिखते। लेकिन अनियमितताओं के लगातार उठ रहे आरोपों ने यह संकेत दिया कि निर्णय लेने की प्रक्रिया केंद्रित और अपारदर्शी हो रही है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह तर्क दिया कि यह स्थिति राज्य सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति के उलट है, जिसका उद्देश्य भ्रष्टाचार को समाप्त करना है। उनका कहना है कि जब परिषद में इस तरह की शिकायतें सामने आती हैं तो यह न केवल स्थानीय प्रशासन पर सवाल खड़े करता है बल्कि सरकार की छवि पर भी असर डालता है।
नगर के युवा संगठनों ने भी विभिन्न मंचों पर कहा कि नगर पालिका परिषद को मजबूत जवाबदेही व्यवस्था अपनाने की जरूरत है। वार्ड स्तर पर जनता से संवाद की कमी, कार्यों की जानकारी सार्वजनिक न करना और शिकायतों का समय पर निस्तारण न होना इस बात का संकेत है कि प्रशासनिक प्रणाली अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई है। युवा समूहों ने इस मामले में शासन स्तर पर हस्तक्षेप की मांग की है ताकि नगर की विश्वसनीयता कायम रह सके।
परिषद के पूर्व अधिकारियों और कुछ वरिष्ठ कर्मचारियों ने भी अनौपचारिक बातचीत में कहा कि पिछले वर्ष में परिषद के कार्यों की गति तो बढ़ी, लेकिन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही। उन्होंने बताया कि विभागीय बैठकों में उठाए गए सवालों को कई बार आगे नहीं बढ़ाया गया। कई तकनीकी प्रोजेक्ट्स में अनुमानित लागत और स्वीकृत राशि के बीच गंभीर अंतर पाया गया, जिस पर विस्तृत जांच की जरूरत है। हालांकि इन आरोपों की सत्यता की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी, लेकिन इसने स्थानीय राजनीतिक वातावरण को जरूर गर्म कर दिया है।
राजनीतिक हलकों में इस मामले को लेकर चर्चा तेज है। विपक्षी दलों के स्थानीय नेताओं का कहना है कि नगर पालिका परिषद का यह रवैया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस छवि को नुकसान पहुंचा सकता है, जिसमें वे प्रशासनिक ईमानदारी और भ्रष्टाचार पर सख्त रुख रखने के लिए जाने जाते हैं। नेताओं ने यह भी कहा कि यदि स्थानीय स्तर पर अधिकारी और निर्वाचित प्रतिनिधि ही नियमों को नजरअंदाज करेंगे तो जनता में गलत संदेश जाएगा और सरकार की साख प्रभावित होगी।
जिले की विभिन्न सामाजिक संस्थाओं ने शासन को पत्र भेजकर मांग की है कि आरोपों की खुली, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए। उन्होंने कहा कि यदि इन मामलों की जांच में पारदर्शिता नहीं होगी तो नगर प्रशासन पर से जनता का भरोसा टूट सकता है। शिकायतकर्ताओं ने यह भी कहा कि नगर के विकास कार्यों को राजनीतिक या व्यक्तिगत लाभ का साधन नहीं बनना चाहिए। नगर की समस्याएं वास्तविक हैं और उन्हें समाधान की जरूरत है, न कि कागजी उपलब्धियों की।
नगर के कई बुजुर्ग नागरिकों ने भी पूरे मामले पर अपनी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि पहले की तुलना में नगर की स्थिति बिगड़ी है और यह केवल सफाई तक सीमित नहीं है। जल निकास, पेयजल वितरण, सड़क मरम्मत, फुटपाथ, डेंगू नियंत्रण और पार्क सुधार जैसे क्षेत्रों में भी अपेक्षित प्रगति नहीं दिखी। नागरिकों का यह भी कहना है कि उनमें यह निराशा है कि शिकायतों के बाद भी परिषद ने जवाबदेही को गंभीरता से नहीं लिया।
इस बढ़ते विवाद के बीच जनता की उम्मीदें शासन की ओर टिकी हैं। नागरिकों का कहना है कि यदि सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति को जमीनी स्तर पर लागू किया गया होता तो आज ऐसे आरोप न उठते। उन्होंने कहा कि जौनपुर जैसे महत्वपूर्ण नगर में विकास कार्यों का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए और किसी भी अनियमितता पर तत्काल कार्रवाई जरूरी है। कई नागरिकों ने सवाल उठाया कि जब शासन की ओर से साफ निर्देश हैं कि कोई भी काम बिना टेंडर, बिना पारदर्शिता और बिना स्पष्ट स्वीकृति के नहीं होना चाहिए, तो फिर परिषद ने इन नियमों का पालन क्यों नहीं किया।
स्थानीय बुद्धिजीवियों ने यह भी कहा कि नगर प्रशासन को यह समझना होगा कि शासन के स्तर पर ईमानदारी और सख्ती की जो छवि बनाई गई है, उसे स्थानीय स्तर पर कमजोर नहीं होने दिया जा सकता। उन्होंने दोनों अधिकारियों पर लगे आरोपों को गंभीर माना और कहा कि यदि यह सब तथ्यों पर आधारित पाया गया, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की बड़ी विफलता होगी।