जौनपुर नगर पालिका परिषद में अनियमितताओं को लेकर बढ़ा विवाद

Alok Verma, Jaunpur Bueauro,

जौनपुर नगर पालिका परिषद में अनियमितताओं को लेकर बढ़ा विवाद

अध्यक्ष मनोरमा मौर्या और अधिशासी अधिकारी पवन कुमार पर उठे सवाल, जांच की मांग तेज

जौनपुर। नगर पालिका परिषद जौनपुर पिछले एक वर्ष से लगातार विवादों और आरोपों के घेरे में है। बोर्ड बैठकों, सभासदों की शिकायतों, सोशल ऑडिट रिपोर्टों तथा नागरिक संगठनों द्वारा उठाए गए प्रश्नों के बाद परिषद के कार्य संचालन पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। परिषद अध्यक्ष मनोरमा मौर्या व अधिशासी अधिकारी पवन कुमार पर आरोपों की लंबी सूची चर्चाओं और अभिलेखों में दर्ज है, जिनकी जांच की मांग अब और तेज हो गई है।

हालांकि यह सभी आरोप अभी जांचाधीन या दावों/शिकायतों पर आधारित हैं, लेकिन नगर की कार्यप्रणाली को लेकर उठी ये बातें जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच व्यापक सरोकार का विषय बन चुकी हैं।

1. बिना टेंडर के कार्य कराने को लेकर गंभीर सवाल

पिछले एक वर्ष में कई सभासदों ने आरोप लगाया कि नगर पालिका क्षेत्र में छोटे-बड़े निर्माण और रखरखाव कार्यों का आवंटन नियमित टेंडर प्रक्रिया के बिना किया गया।

शिकायतों में कहा गया कि

कई कार्य कोटेशन या ई-टेंडर प्रक्रिया के अभाव में मनमर्जी के ठेकेदारों को दिए गए।

प्रस्तावित लागत और वास्तविक व्यय में अंतर के बिंदु बार-बार सामने आए।

वार्डों में कराए गए कार्यों की ग्राउंड रिपोर्ट और बिलिंग में सामंजस्य नहीं मिला।

बोर्ड बैठक में सभासदों ने इसे पिछले वर्षों की नगर पालिका नियमावली का उल्लंघन बताया और इसकी जांच के लिए जिला स्तर पर समिति गठित करने की मांग रखी।

2. डीज़ल खर्च पर विवाद छह माह में दो करोड़ का भुगतान

नगर पालिका के वाहनों, मशीनों और स्टाफ उपयोग के नाम पर हुए डीज़ल खर्च को लेकर सबसे अधिक प्रश्न उठे।

शिकायतों और अभिलेखों में कहा गया कि

सिर्फ 6 महीने के भीतर लगभग 2 करोड़ रुपये का डीज़ल उपभोग दिखाया गया।

कई वाहनों की मीटर रीडिंग और चालान पर्चियों में विरोधाभास पाया गया।

जिन वाहनों को लंबे समय से नॉन-ऑपरेशनल बताया गया था, उनके नाम पर भी डीज़ल निर्गत दिखाया गया।

वार्डों में कूड़ा वाहनों की नियमित आवाजाही का दावा किया गया, जबकि कई सभासदों के अनुसार जमीनी स्थिति इसके विपरीत रही।

यह मामला उठने पर जिला प्रशासन ने रिकॉर्ड तलब किया, जिस पर आगे की जांच की मांग लंबित है।

3. सफाई सेवाओं में अनियमितता और भुगतान पर आपत्ति

नगर की सफाई व्यवस्था पर हमेशा सवाल उठते रहे, लेकिन पिछले साल सफाई कर्मचारियों, सुपरवाइज़र गतिविधियों और निजी फर्मों को किए गए भुगतान को लेकर भी विवाद गहराया। शिकायतों में कहा गया कि

सफाई कर्मियों की उपस्थिति और भुगतान में अंतर पाया गया।

कई वार्डों में सफाई कार्यों के ठेके में पारदर्शिता की कमी देखने को मिली।

निजी सफाई एजेंसियों को भुगतान ड्यूटी रिपोर्ट के सत्यापन के बिना किए जाने की बात सामने आई।

कूड़ा उठान वाहनों की वास्तविक संख्या और दिखाई गई संख्या में भी भिन्नता के आरोप लगे।

इन सभी बिंदुओं पर पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए रिकॉर्ड की समीक्षा आवश्यक बताई गई।

4. सामग्री खरीद में गड़बड़ी के आरोप

नालियों, सड़कों, लाइटों तथा छोटे-बड़े निर्माणों में उपयोग होने वाली सामग्री—जैसे सीमेंट, इंटरलॉकिंग, पाइप, बिजली उपकरण आदि की खरीद पर भी सवाल खड़े हुए। आरोपों में कहा गया

सामग्रियों की खरीद बाजार दरों से अधिक मूल्य पर दिखाई गई।

वितरित सामग्री की गुणवत्ता और मात्रा पर ठोस रिपोर्ट नहीं रखी गई।

कई कार्य स्थलों पर वास्तविक उपयोग और बिल में दर्शाई गई मात्रा में विरोधाभास पाया गया।

स्टॉक रजिस्टर और बिलों में रिकॉर्ड का मेल न बैठना भी कई सभासदों ने उठाया।

इन आरोपों पर अध्यक्ष और ईओ से जवाब मांगा गया, लेकिन विस्तृत ऑडिट अभी प्रतीक्षित है।

5. विकास योजनाओं में देरी और फंड उपयोग पर प्रश्न

नगर की कई परियोजनाएँ—जैसे सड़क विस्तार, नाली निर्माण, पार्कों का रख-रखाव, हाई-मास्ट लाइट स्थापना आदि निर्धारित समय सीमा में पूर्ण नहीं हो सकीं। सभासदों द्वारा कहा गया

कई वार्डों में वर्ष 2023–24 के लिए स्वीकृत कार्य अधूरे हैं।

कार्यों के निरीक्षण में समन्वय की कमी देखी गई।

फंड उपयोग की त्रैमासिक रिपोर्ट्स समय पर प्रस्तुत नहीं की गईं।

निगरानी तंत्र के कमजोर होने को भी प्रमुख कारण बताया गया।

6. टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर लगातार सवाल

टेंडर प्रक्रिया में

बोलीदाताओं की संख्या कम होना,

बार-बार एक ही फर्मों का चयन होना,

टेंडर नोटिस का समय से प्रकाशन न होना,

तकनीकी मूल्यांकन में स्पष्टता न होना

जैसी बातें बार-बार सामने आईं।

सभासदों ने इस विषय पर लिखित आपत्ति भी दर्ज की और एक स्वतंत्र तकनीकी जांच समिति की मांग की।

7. संपत्तियों के लाइसेंस नवीनीकरण और शुल्क निर्धारण में अनियमितता

नगर पालिका की दुकानें, होर्डिंग्स, भवन परमिट, नक्शा पासिंग तथा अन्य शुल्कों में—

नवीनीकरण प्रक्रिया में ढिलाई,

पुराने बकाये न वसूल होना,

चयनात्मक रूप से नोटिस जारी होने,

विज्ञापन कर और संपत्ति कर में वसूली के आंकड़ों में अनियमितता

को कई सभासदों ने गंभीर चिंता का विषय बताया।

 

8. शिकायतों के निस्तारण में असमानता

सार्वजनिक शिकायतों की ऑनलाइन व ऑफलाइन व्यवस्था में—

शिकायतें लंबित रहने,

कुछ मामलों में तेजी से कार्रवाई, जबकि कई में अनदेखी,

रिपोर्टिंग सिस्टम में गड़बड़ी

को लेकर भी प्रश्न उठे।

जनता के अनुसार कई बार “कॉल कर देने” तक कार्रवाई सीमित रही।

9. सभासदों और अधिकारियों में तालमेल की कमी

पिछले एक वर्ष में कई बोर्ड बैठकें विवादों का केंद्र बनीं। सभासदों ने आरोप लगाया कि—

बैठक के एजेंडा समय पर उपलब्ध नहीं कराए गए।

बड़े वित्तीय प्रस्तावों पर विस्तृत चर्चा का अवसर नहीं मिला।

निरीक्षण रिपोर्ट साझा न करने और निर्णयों को एकतरफा लागू करने की शिकायतें बढ़ीं।

यह स्थिति नगर प्रशासन की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगाती रही।

10. जिला प्रशासन की भूमिका और लंबित जांचें

कई गंभीर शिकायतें जिला प्रशासन तक पहुंचीं।

जिलाधिकारी कार्यालय द्वारा—

खर्च विवरण,

डीज़ल उपभोग,

टेंडर रिकॉर्ड,

सफाई भुगतान,

निर्माण कार्यों के बिल

आदि की प्रतियां मांगे जाने की पुष्टि हुई है।

कई मामलों में प्रारंभिक जांच चल रही है, लेकिन अंतिम रिपोर्ट अभी लंबित है।
जनप्रतिनिधियों की मांग है कि सभी रिकॉर्ड की तकनीकी और वित्तीय ऑडिट कराई जाए तथा दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की जाए।

जौनपुर नगर पालिका परिषद पिछले एक वर्ष में आरोपों और सवालों से घिरी रही है। अध्यक्ष मनोरमा मौर्या और अधिशासी अधिकारी पवन कुमार पर उठे आरोप सिद्ध होने शेष हैं, लेकिन जनप्रतिनिधियों और नागरिक संगठनों द्वारा उठाए गए मुद्दों को देखते हुए एक व्यापक, पारदर्शी और स्वतंत्र जांच की आवश्यकता महसूस की जा रही है। शहर की जनता चाहती है कि जिम्मेदारी तय हो और विकास कार्य पारदर्शिता के साथ आगे बढ़े।

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