जौनपुर नगर पालिका में करोड़ों के काम बिना टेंडर

Alok Verma, Jaunpur Bueauro,

जौनपुर नगर पालिका में करोड़ों के काम बिना टेंडर

DM चुप, बोर्ड भड़का ,मामला शासन तक नहीं पहुँचा

सभासदों का आरोप, छह महीने में दो करोड़ का डीजल “ये खर्च नहीं, किसी और चीज़ का हिसाब लग रहा है”

बोर्ड मीटिंग में हंगामा — आधे में ही स्थगित।
किसी अधिकारी पर कार्रवाई नहीं, न जांच कमेटी बनी।
जनता पूछ रही — “क्यों दब रहा है मामला?”
जौनपुर से, आलोक वर्मा

नगर पालिका परिषद जौनपुर की हालिया बोर्ड मीटिंग में लगे आरोपों ने नगर निकाय की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। कहा गया कि 50–50 लाख तक के काम बिना खुले टेंडर, बिना बोर्ड अनुमति और बिना पारदर्शी प्रक्रिया के दिए गये। इससे भी बड़ा आरोप — सिर्फ छह महीने में दो करोड़ रुपये का डीज़ल खर्च दिखा दिया गया, जबकि ज़मीन पर उतनी गतिविधि दिखाई ही नहीं देती।

मीटिंग में उपस्थित सभासदों ने इसे “सिस्टमेटिक मैनिपुलेशन” बताया और कई ने खुलकर कहा कि
“काम पहले फिक्स, टेंडर बाद में जारी — वो भी ऐसी जगह जहाँ कोई देख ही न पाए।”

हंगामा इतना बढ़ा कि बैठक बीच में ही उठानी पड़ी।
इनसाइड रिपोर्ट: अधिकारी चुप क्यों?
कई दिन बीत जाने के बाद भी
न जिलाधिकारी की ओर से कोई प्रेस बयान,

न कोई जांच आदेश,

न किसी अधिकारी की जवाबदेही तय,
न ही फाइलों के ऑडिट की सूचना।

प्रशासन की यह चुप्पी शहर में सबसे बड़ा सवाल बन गई है।

क्या मामला मुख्यमंत्री तक पहुँचा?

सभासदों ने आरोपों को आधिकारिक रूप से शासन तक भेजने की बात कही थी, लेकिन अभी तक:

कोई पुष्टि नहीं कि रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी तक पहुँची,

न मीडिया में कोई सरकारी प्रतिक्रिया,
न ही किसी स्तर पर कार्रवाई का संकेत।
कई स्थानीय लोग पूछ रहे हैं —
“इतना बड़ा वित्तीय मामला अगर लखनऊ तक नहीं पहुँचा, तो रास्ते में किसके ऑफिस में फाइल अटक गई?”

बॉक्स न्यूज़: पुराने मामलों की फाइलें भी दबे स्वर में उठीं

एक करोड़ वाले पार्क निर्माण में घटिया काम की शिकायत,

बिना सत्यापन भुगतान की खबर,

और कई छोटी फाइलों में अनियमितता के आरोप पहले से चर्चा में।

नागरिकों का कहना है कि नगर पालिका में “फाइलें बंद, सवाल बंद, कार्रवाई बंद” वाली संस्कृति बन चुकी है।

शहर में चर्चा: “कुछ तो है, जो दिख नहीं रहा”

बोर्ड सदस्यों के आरोपों और प्रशासन की चुप्पी ने शहर में कानाफूसी बढ़ा दी है।
लोग पूछ रहे हैं:

“टेंडर बड़े अखबारों में क्यों नहीं निकाले गए?”

“अगर सब सही था, तो मीटिंग में हंगामा क्यों हुआ?”

“DM ने खुद जांच क्यों नहीं शुरू की?”

“फाइल शासन तक क्यों नहीं पहुँच रही?”

अंदरखाने यह भी जानकारी निकल रही है कि कुछ अधिकारी इस मामले पर बोलने से बच रहे हैं, और कई फाइलें “समीक्षा में” बताकर रोक दी गई हैं।

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