शहर के चिल-पों में—
त्रिलोक नाथ पाण्डेय
शहर के चिल-पों में
भागती कारों में
उठते नारों में
बैठते बैठकों में
गहमागहमी भरे बाज़ारों में
पार्क के निचाट कोनों में
एक तुम्हारी कमी है।
सिर्फ, तुम्हारी कमी है।
शहर के महंगे रेस्त्रां के
एकांत कोने में
जहां तुम बैठते थे
कप पर कप काफी पीते हुए
और अपने लैपटाप पर जल्दी-जल्दी कुछ टाइप करते हुए
वहाँ अब तुम्हारी कमी है।
रेस्त्रां में वैसी ही चहल-पहल है
तुम्हारी कोने की मेज पर
एक जवान जोड़ा आपस में गुंथा हुआ
कुछ फुसफुसा रहा है।
उस कोने की इकलौती उदासी को
अब भी तुम्हारा इंतजार है।