Alok Verma, Jaunpur Bueauro,
निराश कर रहा है कायस्थों को कायस्थ नेतृत्व
बीजेपी के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर रखने वाले समाज में बढ़ रही नाराजगी
उत्तर प्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में कायस्थ समाज के बीच अपने ही नेतृत्व को लेकर असंतोष की भावना लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी के प्रति लंबे समय से सॉफ्ट कॉर्नर रखने वाले कायस्थ वर्ग में अब निराशा और उपेक्षा की चर्चा खुलकर होने लगी है।
समाज के लोगों का कहना है कि वर्षों से भाजपा को समर्थन देने के बावजूद कायस्थ समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक भागीदारी के स्तर पर अपेक्षित महत्व नहीं मिल पा रहा। वहीं समाज के बड़े माने जाने वाले चेहरे भी इस मुद्दे पर प्रभावी ढंग से आवाज उठाते नहीं दिख रहे, जिससे आम कार्यकर्ताओं और युवाओं में नाराजगी बढ़ रही है।
कायस्थ समाज पारंपरिक रूप से शिक्षा, प्रशासन और राजनीतिक समझ रखने वाला वर्ग माना जाता रहा है। लेकिन वर्तमान समय में समाज के कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि नेतृत्व केवल व्यक्तिगत राजनीतिक समीकरणों तक सीमित होकर रह गया है और समाज के सामूहिक हित पीछे छूटते जा रहे हैं।
युवाओं का कहना है कि भाजपा के प्रति सकारात्मक सोच रखने वाले कायस्थों को उम्मीद थी कि पार्टी और सरकार में समाज की भागीदारी अधिक मजबूत होगी, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उन्हें अपेक्षित स्थान नहीं मिला। यही कारण है कि अब समाज के भीतर आत्ममंथन और नए नेतृत्व की मांग तेज होती जा रही है।
सामाजिक संगठनों का कहना है कि केवल चुनावी समर्थन ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि समाज को राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में प्रभावी हिस्सेदारी भी मिलनी चाहिए। कई लोगों ने यह भी माना कि यदि नेतृत्व समाज की भावनाओं और अपेक्षाओं को मजबूती से नहीं उठाएगा, तो आने वाले समय में असंतोष और गहरा सकता है।
हालांकि समाज के कुछ वरिष्ठ लोगों का मानना है कि अभी भी संवाद और संगठनात्मक सक्रियता के माध्यम से स्थिति को बेहतर बनाया जा सकता है। उनके अनुसार नई पीढ़ी को आगे लाकर मजबूत और स्पष्ट नेतृत्व तैयार करना समय की आवश्यकता है।