नवनीत सहगल का अचानक इस्तीफ़ा और हिरेन जोशी की चुप्पी—दिल्ली की सत्ता में क्या चल रहा है

Alok Verma, Jaunpur, Bueauro,

नवनीत सहगल का अचानक इस्तीफ़ा और हिरेन जोशी की चुप्पी—दिल्ली की सत्ता में क्या चल रहा है

दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों दो घटनाएँ सबसे अधिक चर्चा में हैं। पहली—प्रासार भारती के चेयरमैन नवनीत कुमार सहगल का अचानक इस्तीफ़ा। दूसरी—प्रधानमंत्री कार्यालय की संचार टीम से जुड़े माने जाने वाले हिरेन जोशी का असामान्य रूप से कुछ दिनों तक गायब रहना और फिर चुपचाप लौट आना। सरकार की ओर से किसी भी घटना पर एक शब्द तक न बोलने ने इन दोनों मामलों को और ज्यादा रहस्यमय बना दिया है।

नवनीत सहगल का इस्तीफ़ा अपने आप में बड़ा सवाल है। वे ऐसे IAS अफसर हैं जिनके पास प्रशासन और प्रसारण—दोनों का लंबा अनुभव है। प्रासार भारती उनके कार्यकाल में बड़े डिजिटल परिवर्तन की ओर बढ़ रहा था। फिर अचानक इस्तीफ़ा, और मंत्रालय ने बिना देरी उसे स्वीकार भी कर लिया। न कोई विवाद सामने आया, न कोई सार्वजनिक मतभेद, न कोई सरकारी स्पष्टीकरण। इतनी चुप्पी आम तौर पर तभी होती है जब फैसला पहले से तय हो और सिर्फ औपचारिकता बाकी हो।

उधर हिरेन जोशी का मामला और दिलचस्प है। वर्षों से प्रधानमंत्री की डिजिटल रणनीति से जुड़े माने जाने वाले जोशी अचानक सरकारी और मीडिया नेटवर्कों से गायब दिखे। कुछ दिन तक न कोई संदेश, न कोई गतिविधि, न कोई उपस्थिति। इसके बाद वे फिर वैसे ही दिखने लगे जैसे पहले थे। सोशल मीडिया पर इस दौरान कई दावे उछले—किसी ने कहा कि उन्हें हटा दिया गया, किसी ने कहा कि उनकी भूमिका घटाई गई है। लेकिन न PMO ने कुछ कहा, न किसी आदेश की पुष्टि मिली। यानी सब कुछ भ्रम और अटकलों के सहारे चलता रहा।

दोनों घटनाएँ एक ही समय पर क्यों हुईं? क्या सिर्फ संयोग? या सरकार अपने सूचना व संचार ढांचे में कोई बड़े बदलाव की तैयारी में है? यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि दोनों पद—प्रासार भारती और PMO कम्युनिकेशन—सरकारी संदेश, छवि निर्माण और मीडिया रणनीति की रीढ़ माने जाते हैं। यदि दोनों जगह एक ही दौर में हलचल हुई, तो इसका मतलब सिर्फ इतना नहीं कि दो लोग बदले—बल्कि यह कि सरकार अपने प्रचार और संचार मॉडल को नए सिरे से सेट कर रही है।

विपक्ष ने सरकार से जवाब मांगा, पर सरकार खामोश है। यह खामोशी ही असल कहानी को और भारी बनाती है। कहीं यह बदलाव चुनावी साल की तैयारी का हिस्सा तो नहीं? क्या नई मीडिया टीम बनाई जा रही है? क्या डिजिटल प्रचार की रणनीति को दोबारा डिज़ाइन किया जा रहा है? आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया, लेकिन संकेत साफ़ हैं कि दिल्ली में कुछ बड़ा ज़रूर बदल रहा है।

जब तक सरकार खुलकर कुछ नहीं बताती, दोनों घटनाएँ सवालों के घेरे में रहेंगी। लेकिन इतना तय है कि यह सिर्फ दो पदों की कहानी नहीं है—यह सरकार की पूरी सूचना मशीनरी के नए दौर की शुरुआत का इशारा हो सकता है।

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