आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,

प्रसार भारती की सफाई — अब ज़रूरत है पारदर्शिता की
पिछले वर्ष, प्रसार भारती ने अपने उच्च स्तर की फेसबुक-शो थिंकिंग रवायत का एक नया अध्याय शुरू किया — जब उसने अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव के मंच से अपनी एप्प WAVES (वेव्स) लॉन्च की। लेकिन, शुरू में ही नाम को लेकर उठी आलोचनाएँ एक तरफ; अब इस वेब-प्लैटफ़ॉर्म द्वारा दिखाए जाने वाले धारावाहिकों, वेब-सीरीज़ व फिल्मों के बंटवारे तथा ख़रीदारी को लेकर हुई गहन गतिशीलता ने एक नए विवाद का रूप ले लिया है।
मुंबई, यानी हिंदी सिनेमा की नगरी में, वेव्स और दूरदर्शन के नाम पर बीते एक साल में जो फिल्में, सीरीज़ और धारावाहिक स्वीकृत हुए — जिन पर खर्च की गई धनराशि — उसकी सूची यदि सार्वजनिक कर दी जाए, तो ‘दूध का दूध, पानी का पानी’ हो जाएगा।
उदाहरण के लिए, लोक-गायकों पर आधारित एक रियलिटी शो — फोक स्टार्स माटी के लाल — दूरदर्शन द्वारा मंजूर हुआ था। इस शो की रूपरेखा मेरा प्रस्तावित था; मैं स्वयं निर्माता के साथ दूरदर्शन कार्यालय गया था, और प्रस्तुति दी थी। निर्माता को विश्वास था कि ‘सेटिंग’ हो चुकी है। बाद में जब कॉन्सेप्ट और ट्रीटमेंट बिल्कुल मेल खाते पाए गए, तो फिर भी कहीं से चोरी का आरोप नहीं उभर सका।
लेकिन इससे पहले, उसी निर्माता ने मेरे एक और आइडिया — सौ करोड़ का कवि — को बिना सूचना दिए प्रस्तुत कर दिया। इस नकल की भी ठीक मौके पर पहचान हो गई। निर्माता ने स्वयं पैर छूकर माफी मांगी और हर एपिसोड के लिए तय कॉन्सेप्ट फीस भी दी।
अब, बात जिस स्थिति की है: पिछले एक साल में, दूरदर्शन/वेव्स से काम की उम्मीद लगाए कम-से-कम तीन निर्माता मेरे संपर्क में रहे। इनमें से एक सीधे उन वरिष्ठ अफसरों से जुड़ा था — जिनकी ‘सेटिंग’ कल गिरती बताई जा रही है। तीनों ही सक्षम निर्माता हैं, लेकिन ‘सेटिंग’ कराने में पूरी तरह अक्षम साबित हुए। उनके अनुभव, चर्चित घटनाएँ और मिले झटकों की कहानी अपने आप में एक अलग सस्पेंस-थ्रिलर होगी।
यह देखना हैरानी की बात है कि इतना कुछ घटने के बावजूद, प्रसार भारती के अध्यक्ष का इस्तीफ़ा लेकर भी — जिसे बुधवार को स्वीकार कर लिया गया — यह खबर प्रमुखता से नहीं आई। सोची समझी कोई तैयारी नहीं; फिर भी ‘कहानी’ अपनी चाल से मीडिया की देहरी तक पहुँच गई — ऐसे प्रयासों के बावजूद जिन्हें खबरों से छुपाया जाना था।
इस सफाई की जरूरत अब सिर्फ एक व्यक्ति, या एक विभाग तक सीमित नहीं है। उस विभाग की भी ज़रूरत है — जिसने हाल ही में गोवा अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव का आयोजन किया है। मंत्रालय को चाहिए कि उन अफसरों से — जो 2026 के बाजार में भाग ले रहे भारतीय निर्माताओं के साथ अनुबंधित फ़िल्मों/सीरीज़ की खरीद-बिक्री कर चुके — उनकी पूरी लिस्ट माँग ले।
कई लोग यह चाहते हैं कि गोवा को अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव का ठिकाना न बनाये रखा जाए। मैं मानता हूँ कि एक अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह को एक ही स्थान पर स्थिरता दी जानी चाहिए — लेकिन, यह लोभ या पारिवारिक पिकनिक का माध्यम नहीं होना चाहिए।
गोवा फ़िल्म फेस्टिवल में उन्हें फिल्में दिखानी चाहिए, जो कुछ महीनों बाद Golden Globe Awards, Academy Awards (ऑस्कर) या Cannes Film Festival जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में भारत का नाम ऊँचा कर सकें। इस लक्ष्य के लिए हमें ज़रूरत है — काबिल, प्रतिबद्ध और ईमानदार लोगों की; न कि ऐसी व्यवस्थाओं की, जिने सिर्फ़ बंद दरवाज़ों के पीछे फ़ैमिली-पिकनिक बना दिया गया हो।
समय आ चुका है — सिर्फ सफाई से काम नहीं चलेगा: पारदर्शिता, जवाबदेही और पत्रकारिता-मन के साथ एक सार्वजनिक लेखा-जोखा चाहिए।