आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,

भारत सरकार की ₹1.5 ट्रिलियन गोल्ड बॉन्ड ऋण जनता पर भारी पड़ी
जिसे एक “स्मार्ट आइडिया” कहा गया था, वह अब एक भारी दायित्व बन चुका है। इस योजना को आगे बढ़ाने वाले मंत्री और बाबुओं को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। नीतिगत भूलों के वास्तविक परिणाम होते हैं। बिना निकास योजना वाली नीतियों की कीमत देशवासियों को चुकानी पड़ती है।
भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए गोल्ड बॉन्ड स्कीम को एक चतुर वित्तीय कदम के रूप में प्रचारित किया गया था, लेकिन अब यह एक बड़े वित्तीय बोझ के रूप में उभरा है। ₹1.5 ट्रिलियन (15 लाख करोड़ रुपये) का यह ऋण सरकार के सिर का दर्द बन गया है जिसे समाचार माध्यमों से छिपाया जा रहा है।
सरकार ने निवेशकों को आकर्षित करने और सोने के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए गोल्ड बॉन्ड जारी किए थे। इन बॉन्ड्स पर सरकार को अब भारी ब्याज चुकाना पड़ रहा है।
सोने की कीमतों में चढ़ाव और ब्याज दरों के बदलाव ने इस योजना को और जटिल बना दिया। समय पर स्पष्ट निकास योजना न होने से यह दायित्व बेतहाशा बढ़ता गया।
₹1.5 ट्रिलियन का यह दायित्व देशवासियों के GST के पैसे से चुकाया जा रहा है।
ऐसे निर्णयों के लिए जिम्मेदार प्रधानमंत्री, संबंधित मंत्री और अधिकारियों को जवाबदेह ठहराना जरूरी है।
वित्तीय निर्णय लेते समय जोखिमों का गहन आकलन जरूरी है ।सरकारी नीतियों में पारदर्शिता महत्वपूर्ण है।