ब्यूरो,

आरएसएस का अर्थ-चिंतन : एम एम जोशी ने दिखायी आर्थिकी की हकीकत !!
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘अर्थ समूह’ की बैठक में वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने लगभग 70 स्लाइड्स के जरिए दिखाया कि देश की आर्थिक प्राथमिकताएं किस हद तक गलत दिशा में हैं। उन्होंने बढ़ती आर्थिक गैर-बराबरी की आलोचना की और भारत में प्रति व्यक्ति आय की निम्न दर की ओर ध्यान खींचा।
91 वर्षीय जोशी ने ग्रोथ केंद्रित आर्थिक विमर्श से बाहर निकलने का आह्वान किया। “डी-ग्रोथ” की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि सार्वजनिक विमर्श का ध्यान आर्थिक वृद्धि दर से हटाने की जरूरत है। मकसद सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति करना होना चाहिए। जोशी की प्रस्तुति के बाद संघ सरसंघचालक मोहन भागवत ने उनका समर्थन करते हुए कहा- ‘जोशी जी ने सब कुछ कह दिया है।’
भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और जबरदस्ती 75 साल के फार्मूले के तहत मार्गदर्शक मंडल में धकेले गए मुरली मनोहर जोशी ने अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता अमृत्य सेन के तर्कों का हवाला देकर मोदी सरकार की आर्थिक नीति पर सवाल खड़े कर दिए, उन्होंने अपनी क़रीब 70 पेज की रिपोर्ट संघ के सामने पेश कर बताया कि आर्थिक विकास किसी भी देश का एकमात्र मकसद नहीं हो सकता।
जोशी ने देश में आय की असमानता और भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी को लेकर भी सवाल खड़े किए, दूसरी ओर, मोदी भारत को जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का ढिंढोरा पीट रहे हैं।
पिछले महीने खुद संघ प्रमुख ने शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की महंगाई पर चिंता जताई थी। कहा था कि शिक्षा और इलाज सामान्य व्यक्ति की पहुंच से बाहर हो गए हैँ। उन्होंने कहा कि ये सेवाएं कुछ शहरों तक सीमित और इतनी महंगी हैं कि इन्हें पाने के लिए वंचित वर्ग को भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। ये तमाम बातें नरेंद्र मोदी सरकार की आर्थिक सफलता के दावे का सिरे से खंडन करती हैँ।
अनेक गंभीर अर्थशास्त्री और जमीनी स्थिति से परिचित लोग इस ओर लगातार ध्यान खींचते रहे हैं। मगर आज मीडिया एवं विमर्श पर सत्ता पक्ष का ऐसा नियंत्रण है कि उनकी बातें छोटे से दायरे में सिमटी रही हैं। पर आरएसएस के “क्लोज डोर मीटिंग” से निकले विमर्श की आवाज दूर तक जाएगी !!