विज्ञापनों का सम्मोहन बनाम ज़मीनी हकीकत

आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,

विज्ञापनों का सम्मोहन बनाम ज़मीनी हकीकत

​भारतीय त्योहारों के मौसम में उत्साह और खरीदारी का रिश्ता बहुत पुराना है, लेकिन हाल के वर्षों में इस परंपरा को कॉर्पोरेट जगत ने डिजिटल ‘फेस्टिव सेल’ के विशाल उत्सव में बदल दिया। हर साल अक्टूबर आते ही अखबारों के पहले पन्ने, टीवी चैनल और डिजिटल स्क्रीन ‘महा-बचत’ और ‘साल की सबसे बड़ी छूट’ के विज्ञापनों से पट जाते हैं। कंपनियाँ सेल के पहले कुछ घंटों में ही लाखों ऑर्डर और अरबों के टर्नओवर के सनसनीखेज दावे कर यह साबित करने में जुट जाती हैं कि देश में उपभोग की कोई कमी नहीं है। हालांकि, इस बार के वस्तुनिष्ठ मार्केट डेटा ने इन कॉर्पोरेट दावों की चमक को फीका कर दिया है।
​सेल के शुरुआती चार दिनों (7 से 10 अक्टूबर) के आंकड़े बताते हैं कि कुल ई-कॉमर्स बिक्री (GMV) करीब ₹29,800 करोड़ से ₹30,900 करोड़ के दायरे में सिमट गई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह ₹33,200 करोड़ थी। सालाना आधार पर 7 से 10 प्रतिशत की यह गिरावट कोई मामूली तकनीकी फेरबदल नहीं है; भारतीय ई-कॉमर्स के इतिहास में संभवतः यह पहला मौका है जब फेस्टिव सेल की शुरुआत इतनी ठंडी और निराशाजनक रही है।
​इस सुस्ती को मात्र एक सामान्य उतार-चढ़ाव मानना आर्थिक वास्तविकता से आँखें मूँदने जैसा होगा। यह गिरावट दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था में गहराते ‘K-शेप्ड’ उपभोग पैटर्न और माध्यम वर्ग की घटती वास्तविक क्रय शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। उच्च-आय वर्ग के लिए प्रीमियम स्मार्टफोन्स और लक्जरी सामानों की मांग में कोई खास कमी नहीं आई है, लेकिन व्यापक जनसामान्य यानी लोअर-मिडिल क्लास द्वारा खरीदा जाने वाला बजट सेगमेंट (10,000 से 25,000 रुपये के फोन, परिधान और घरेलू उपकरण) बुरी तरह प्रभावित हुआ है। खाद्य पदार्थों की लगातार बनी हुई महंगाई और जीवन-यापन के बढ़ते खर्चों ने आम परिवार के बचत खाते पर गहरा असर डाला है।
​इसके साथ ही, यह बदलाव भारतीय उपभोक्ता के बदलते मिज़ाज और समझदारी की ओर भी इशारा करता है। दशकों तक विज्ञापनों के सहारे चलने वाली ‘इंपल्सिव बाइंग’ (आवेगपूर्ण खरीदारी) अब थम रही है। साल भर लगातार चलने वाली छोटी-बड़ी सेल के कारण त्योहारी सेल का वह ‘छूट जाने का डर’ (FOMO) समाप्त हो चुका है। आज का ग्राहक प्राइस-ट्रैकिंग टूल्स और विभिन्न प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये वास्तविक कीमतों की तुलना करने में सक्षम है। वह समझ चुका है कि कई बार 70% छूट का दावा महज़ पहले से बढ़ाए गए दामों पर पर्दा डालने की युक्ति होती है। इसके अलावा, पिछले वर्षों में ‘बाय नाउ पे लेटर’ (BNPL) और क्रेडिट कार्ड की सुलभ किस्तों के चलते कई मध्यमवर्गीय परिवार पहले से कर्ज की किस्तों में बंधे हैं, जिससे वे नए गैर-ज़रूरी खर्चों से बच रहे हैं।
​यह रुझान ई-कॉमर्स और कॉर्पोरेट जगत के लिए एक स्पष्ट संदेश है। विज्ञापनों पर अरबों रुपये खर्च करके कृत्रिम मांग का माहौल तो बनाया जा सकता है, लेकिन वह लोगों की जेब में खाली पड़े पैसे का विकल्प नहीं बन सकता। जब तक व्यापक स्तर पर वास्तविक आय में वृद्धि नहीं होती और रोज़गार के अवसर सुरक्षित नहीं होते, तब तक स्थायी उपभोग संभव नहीं है। समय आ गया है कि नीति निर्माता और उद्योग जगत दावों की दुनिया से बाहर निकलकर ज़मीनी हकीकत को पहचानें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *