आलोक वर्मा, जौनबपुर ब्यूरो,
सोशल मीडिया पर बढ़ा सियासी पारा: सपा के कुनबे में ‘सेंधमारी’ का दावा सिर्फ हवा या परदे के पीछे का कोई बड़ा गेम?
उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में इन दिनों दिल्ली की गर्मी से ज्यादा तपिश सोशल मीडिया के दावों से पैदा हो रही है। चाय की अड़ियों से लेकर व्हाट्सएप ग्रुप्स तक में एक ही चर्चा आम है कि समाजवादी पार्टी के कुनबे में बड़ी सेंधमारी की तैयारी चल रही है। दावा तो यहां तक किया जा रहा है कि दो दर्जन से ज्यादा साइकिल सवार माननीय पाला बदलने को बेताब हैं। लेकिन इस पूरी सियासी गपशप के बीच राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले दिल्ली के बड़े नेताओं की खामोशी एक अलग ही कहानी बयां कर रही है।
राजनीतिक पंडितों की मानें तो यह पूरी कहानी असल में जमीन पर किसी बड़ी टूट से ज्यादा एक दिमागी खेल यानी ‘पर्सेप्शन वॉर’ की तरह नजर आती है। चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन माहौल बनाने का खेल अभी से शुरू हो चुका है। विश्लेषकों का एक बड़ा धड़ा मानता है कि विपक्ष के सबसे मजबूत गढ़ में इस तरह की हलचल पैदा करना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है ताकि विपक्षी खेमे को रक्षात्मक मुद्रा में रखा जा सके।
हालांकि, जानकारों का यह भी कहना है कि इस तरह का कोई भी बड़ा कदम उठाना एक दुधारी तलवार साबित हो सकता है। उत्तर प्रदेश की मौजूदा जमीनी हकीकत को देखते हुए अगर विपक्ष को किसी भी तरह से कमजोर करने की कोशिश होती है, तो इसका जनता में उल्टा असर भी हो सकता है। भारतीय राजनीति में जनता अक्सर ‘विक्टिम कार्ड’ यानी सहानुभूति को हाथों-हाथ लेती है। ऐसे में यह कदम फायदे की जगह सियासी नुकसान का सबब भी बन सकता है।
कानूनी पेंच भी इस पूरी कहानी में एक बड़ा रोड़ा है। देश के दलबदल कानून के कड़े नियमों के रहते इतने बड़े पैमाने पर सांसदों को एक साथ लाना किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। यही वजह है कि गंभीर राजनीतिक विश्लेषक इसे फिलहाल केवल एक चुनावी बिसात की मोहरेबाजी मान रहे हैं, जहां शह और मात का असली खेल अभी परदे के पीछे ही है।