आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,
चुनावी बयार ने माननीयों का मानसिक संतुलन बिगाड़ा
चुनावी बयार ने माननीयों का मानसिक संतुलन बिगाड़ा
माननीयों का मानसिक संतुलन बिगाड़ा है चुनावी बयार ने,
कुर्सी की चाहत में उतर आए सड़क पर अखबार ने।
सूरज को दिया 🪔 दिखाने चले हैं, अंधेरे के सौदागर,
अपनी ही रोशनी भूल गए, बन बैठे खुद ही जादूगर।
पांच साल मौन रहे जो, आज मुखर हुए इतने,
वादा करते फिरते हैं, जैसे कल ही लिखी थी जितने।
शिष्टाचार की चादर फेंक, लांछन की बोली बोलें,
मंच से गिरती गालियां, मर्यादा की सीमाएं डोलें।
अरे भाई ये पब्लिक है, सब जानती है भीतर-बाहर,
कौन है सच्चा सेवक और कौन है केवल नाम का नाहर।
भाषण में आग लगाते हैं, वोटों की फसल काटने को,
जाति-धर्म का जाल बिछाते, भाई को भाई से बांटने को।
कैमरे के सामने रोते हैं, आंसू भी अब किराये के,
कल तक जो न दिखे गली में, आज बने हैं साये के।
तुम समझो नासमझ इसे, पर इसकी नजरें तेज हैं,
एक-एक हरकत नोट करती, रखती पूरा लेखा-जोखा है।
वादों के पुल बनाओगे तो नींव भी देखेगी जनता,
काम नहीं तो नाम नहीं, बस यही इसकी सच्ची सत्ता।
अनर्गल बोल से बचोगे तो शायद इज्जत रह जाए,
वरना ये पब्लिक है साहब, सिंहासन से भी उतार लाए।
सोचो, समझो, संभल जाओ, अभी वक्त है थोड़ा बाकी,
नहीं तो चुनावी सूरज उगेगा, और बुझ जाएंगे नकली दिये सारे।