नीतीश कुमार के राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करते ही बिहार में एक नए अध्याय की शुरुआत

ब्यूरो,

नीतीश कुमार के राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करते ही बिहार में एक नए अध्याय की शुरुआत

5 दशकों में पहली बार जेपी मूवमेंट के नेताओं के बिना होगी बिहार की राजनीति

 

नीतीश कुमार बीते 20 सालों से लगातार सीएम या फिर सत्ताधारी दल के नेता के तौर पर बने रहे हैं। लेकिन अब वह दिल्ली का टिकट ले चुके हैं। इस तरह बीते करीब 5 दशकों में पहली बार बिहार की राजनीति जेपी मूवमेंट के नेताओं के बिना होगी।

नीतीश कुमार के राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करते ही बिहार में एक नए अध्याय की शुरुआत हो गई है। 1980 के दशक से अब तक बिहार की राजनीति पर जेपी आंदोलन से निकली तिकड़ी का असर बना रहा है। ये तीन नेता रहे हैं, लालू यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान। इनमें से एक रामविलास पासवान का निधन हो चुका है, जबकि लालू यादव अस्वस्थ रहते हैं और कमान बेटे तेजस्वी को सौंप रखी है। नीतीश कुमार बीते 20 सालों से लगातार सीएम या फिर सत्ताधारी दल के नेता के तौर पर बने रहे हैं। लेकिन अब वह दिल्ली का टिकट ले चुके हैं। इस तरह बीते करीब 5 दशकों में पहली बार बिहार की राजनीति जेपी मूवमेंट के नेताओं के बिना होगी।

इन तीन नेताओं के अलावा एक बड़ा चेहरा सुशील मोदी भी थे, जो नीतीश कुमार के करीबी थे और डिप्टी सीएम रहे थे। उनका भी निधन हो गया था। नीतीश कुमार और उनके समकालीन नेताओं का यह रुतबा रहा कि बिहार के अलावा दिल्ली के समीकरण तय करने में भी उनकी अहम भूमिका रही। यही कारण है कि नीतीश कुमार के दिल्ली जाने के बाद बिहार में सामाजिक समीकरणों पर सबकी नजर रहेगी। नीतीश कुमार ने बिहार में 2005 से अब तक लगातार अति पिछड़ा और अति दलित का जो गुलदस्ता तैयार किया था, वह बिखरा नहीं। इसके कारण आरजेडी अपनी पूरी ताकत झोंकने के बाद भी बहुमत से दूर ही बनी रही।

कुर्मी-कुशवाहा के लवकुश समीकरण वाले 7 फीसदी वोट के अलावा भी नीतीश कुमार सभी के लिए स्वीकार्य रहे। अब नया सीएम भले ही भाजपा से होगा, लेकिन वह उनकी जगह भरने में कितना सक्षम होगा। यह देखने में सभी की दिलचस्पी है। बिहार में जातीय समीकरण हमेशा से अहम रहे हैं, लेकिन उन्हें साधना भाजपा के लिए चुनौती होगा। नीतीश कुमार ने आरजेडी के शासन को जंगलराज का टैग दिया तो उसके मुकाबले अपनी सुशासन बाबू की छवि भी गढ़ी थी। अब भाजपा को देखना होगा कि ऐसा लीडर रहे, जो सुशासन भी लाए और पूरे समाज को साध भी ले।

एक और चिंता यह रहेगी कि महिला कार्ड को भी देखा है। शराब बंदी और जीविका दीदी जैसी योजनाओं से नीतीश कुमार ने महिलाओं के बीच पैठ बनाई है। नीतीश कुमार की जब भी बात होती है तो उससे पहले के 15 सालों के लालू और राबड़ी के शासन की चर्चा होती है। इसी कारण उन्हें एक बढ़त हासिल होती रही है। इसलिए कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा और सशक्तीकरण एवं जातीय समीकरण साधना जरूरी होगा। यदि इन तीन चीजों को भाजपा ने साध लिया तो बिहार में शासन की उसकी पारी लंबी चल सकती है।

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