Bueauro,
उपचार की जरूरत हम डॉक्टरों को भी है!
हमें अपनी लाइफस्टाइल का विश्लेषण करना चाहिए !
डॉ आकाश माथुर.
— एक डॉक्टर की असमय मौत, और एक थकी हुई व्यवस्था
आज फिर एक डॉक्टर की अचानक कार्डियक अरेस्ट से मौत की खबर आई। हर बार की तरह कुछ देर का अफ़सोस, कुछ संवेदनाएँ और फिर सब कुछ सामान्य। लेकिन यह सामान्य नहीं है। यह एक ख़तरनाक पैटर्न बनता जा रहा है, जिस पर अब चुप रहना खुद हमारे लिए घातक हो सकता है।
डॉक्टर बनने का रास्ता केवल लंबा ही नहीं, बेहद कठोर भी होता है। कक्षा 11–12 से शुरू होकर MBBS, इंटर्नशिप, पोस्टग्रेजुएशन और कई बार सुपर-स्पेशलिटी तक यह सफ़र 10 से 15 साल तक खिंच जाता है। जिस उम्र में समाज का बड़ा हिस्सा करियर, परिवार और निजी जीवन का संतुलन बना रहा होता है, उस समय डॉक्टर लगातार परीक्षाओं, ड्यूटी और अस्पतालों के बीच अपनी जवानी खपा रहा होता है।
यह केवल भावनात्मक चिंता नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक तथ्य भी इस ओर इशारा करते हैं। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार 40–60 प्रतिशत डॉक्टर ‘बर्नआउट’ से जूझ रहे हैं, जिसमें भावनात्मक थकान, चिड़चिड़ापन और काम से दूरी जैसी समस्याएँ शामिल हैं। रेज़िडेंट डॉक्टरों पर हुए शोध बताते हैं कि 50 प्रतिशत से अधिक डॉक्टरों की नींद छह घंटे से कम होती है, जबकि वयस्कों के लिए सात से आठ घंटे की नींद आवश्यक मानी जाती है।
लगातार नाइट ड्यूटी और शिफ्ट वर्क से हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़ और हृदय रोग का जोखिम 1.5 से 2 गुना तक बढ़ जाता है। लंबे समय तक तनाव में रहने वाले हेल्थ-केयर प्रोफेशनल्स में डिप्रेशन और एंग्ज़ायटी की दर सामान्य जनसंख्या की तुलना में कहीं अधिक पाई गई है।
विडंबना यह है कि जो डॉक्टर दिनभर मरीजों को सलाह देते हैं—“नींद पूरी लें, नियमित व्यायाम करें, समय पर खाना खाएँ”—वही डॉक्टर अक्सर खुद इन बातों पर अमल नहीं कर पाते। कारण इच्छा की कमी नहीं, बल्कि समय और सिस्टम की कमी है।
शोध बताते हैं कि बड़ी संख्या में डॉक्टर खुद कई स्वास्थ्य मानकों पर असफल पाए जाते हैं—शारीरिक गतिविधि अपर्याप्त होती है, भोजन अनियमित रहता है, वज़न बढ़ता है, तनाव लगातार बना रहता है और समय से पहले हृदय रोग के जोखिम कारक विकसित हो जाते हैं।
एक आम व्यक्ति बीमार पड़ता है तो छुट्टी ले सकता है। डॉक्टर बीमार पड़ता है, फिर भी ड्यूटी पर जाता है क्योंकि “मरीज इंतज़ार कर रहा है।” यही भावना धीरे-धीरे डॉक्टर के शरीर और मन दोनों को तोड़ देती है।
डॉक्टरों की सामाजिक दुनिया भी समय के साथ सिमटती जाती है। दोस्त—अधिकतर डॉक्टर। बातचीत—मरीज, OPD, ICU और केस। पारिवारिक समारोह हों या सामाजिक मिलन, चर्चा अंततः अस्पताल पर ही लौट आती है। शौक, खेल, संगीत और किताबें “फुर्सत के दिनों” के लिए टलती रहती हैं और वे दिन अक्सर आते ही नहीं।
आज डॉक्टरों के बीच सफलता का पैमाना भी बदल गया है। कौन ज़्यादा मरीज देख रहा है, किसकी OPD लंबी है, कौन ज़्यादा व्यस्त है; यही तुलना बन गई है। कम ही लोग यह पूछते हैं कि कौन स्वस्थ है, कौन खुश है और कौन संतुलित जीवन जी रहा है।
यह लेख किसी एक व्यक्ति या पेशे को दोष देने के लिए नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। डॉक्टर कोई मशीन नहीं है। वह भी इंसान है जिसे नींद चाहिए, परिवार चाहिए, सुकून और निजी जीवन चाहिए।
अगर हम चाहते हैं कि डॉक्टर लंबे समय तक स्वस्थ मन और शरीर के साथ समाज की सेवा कर सकें, तो हमें उनके काम के घंटे, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन-संतुलन पर भी उतना ही ध्यान देना होगा, जितना हम उनकी दक्षता पर देते हैं। और डॉक्टरों को भी यह समझना होगा कि केवल “आगे रहने की टेंशन” में कहीं ज़िंदगी पीछे न छूट जाए।
मंज़िल ज़रूरी है, लेकिन रास्ते में ज़िंदा और स्वस्थ रहना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है।
आज यह खबर किसी डॉक्टर की है। कल यह किसी और की हो सकती है। बेहतर है कि इसे सिर्फ़ एक खबर न बनने दें, बल्कि एक ज़रूरी बदलाव की शुरुआत बनाएं।
✍️ डॉ आकाश माथुर
गेस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट