आवास बन्धु बना रिटायर्ड अधिकारियों की सुरक्षित पनाहगाह, आवास एवं शहरी नियोजन विभाग के अधीन संस्था में रिटायरमेंट के बाद भी मलाईदार पोस्टिंग का खेल

ब्यूरो,

आवास बन्धु बना रिटायर्ड अधिकारियों की सुरक्षित पनाहगाह.

आवास एवं शहरी नियोजन विभाग के अधीन संस्था में रिटायरमेंट के बाद भी मलाईदार पोस्टिंग का खेल

लखनऊ। विशेष पड़ताल प्रदीप कुमार उपाध्याय
रिटायर होते ही पुनः तैनाती, सवालों के घेरे में आवास बन्धु

आवास एवं शहरी नियोजन विभाग के अधीन कार्यरत आवास बन्धु आजकल रिटायर अधिकारियों के लिए सुरक्षित ठिकाने के रूप में उभर कर सामने आया है। यहां रिटायरमेंट के बाद अधिकारियों का बेहिसाब स्वागत और पुनः तैनाती किसी गुप्त नीति का संकेत देती है।

सबसे पहले रवि जैन को रिटायरमेंट के तुरंत बाद निदेशक के पद पर बैठाया गया। इसके बाद नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग से सेवानिवृत्त अनिल कुमार मिश्रा को तकनीकी विशेषज्ञ बनाया गया। इसी तरह अनूप कुमार श्रीवास्तव, वरिष्ठ नियोजक, को भी रिटायरमेंट के बाद तकनीकी विशेषज्ञ का पद सौंप दिया गया।

2014 से अब तक ‘सलाहकार’ बने बैठे हैं पूर्व मुख्य नगर नियोजक

सबसे चौंकाने वाला मामला नेक राम वर्मा, पूर्व मुख्य नगर नियोजक का है, जिन्हें वर्ष 2014 में रिटायर होने के बावजूद आज तक ‘सलाहकार’ के पद पर बनाए रखा गया है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा कौन-सा अपरिहार्य योगदान है, जिसके चलते शासन वर्षों से इन्हीं चेहरों पर मेहरबान है?

न पदक, न सम्मान — फिर भी सत्ता की कृपा क्यों?

इन रिटायर अधिकारियों को न तो आवास एवं नियोजन क्षेत्र में किसी राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय पदक से सम्मानित किया गया, न ही कोई असाधारण उपलब्धि दर्ज है। फिर भी बड़े साहब इन्हें बार-बार कुर्सी पर बैठाने में क्यों लगे हैं?
क्या यह योग्यता है या सांठ-गांठ?

नीतियों के नाम पर खामियों का मिश्रण

बेशक प्रदेश में मॉडल भवन निर्माण एवं विकास उपविधि और मॉडल ज़ोनिंग रेगुलेशन्स 2025 जैसे दस्तावेज बने। इसी तरह भारत सरकार की अमृत योजना के तहत प्रदेश के 59 नगरों की महायोजनाएं तैयार हुईं।
सरकार इन्हें उपलब्धि मानती है, लेकिन इन तथाकथित विशेषज्ञों की वजह से इन्हीं दस्तावेजों में गंभीर खामियों का ज़हर घोल दिया गया।

जनता भुगत रही है गलत नीतियों की कीमत

इन खामियों का खामियाजा आज आम नागरिक भुगत रहा है।
प्राधिकरण से क्रय किए गए भूखण्डों पर भी अमलगमेशन में विकास शुल्क वसूला जा रहा है।
महायोजनाएं लागू होते ही भू-उपयोग परिवर्तन के सैकड़ों प्रस्ताव आना इस बात का प्रमाण है कि योजना जमीन पर नहीं, फाइलों में बनी।

यह साफ दर्शाता है कि ये विशेषज्ञ जनहित नहीं, स्वहित में सोचते हैं।

दोहरी नीति का खुला खेल

सबसे बड़ा सवाल दोहरी नीति का है। एक तरफ मानचित्र स्वीकृति के लिए पहले ओबीपीएएस पोर्टल, दूसरी तरफ अब भी फास्ट पास से आवेदन।

इतना ही नहीं, 03 जुलाई 2025 और सितंबर 2025 को जारी दो अलग-अलग बिल्डिंग बाय-लॉज—
कौन-सा असली है, कौन-सा नकली?
आज तक जनता को यह नहीं बताया गया, जबकि दोनों वेबसाइट पर अपलोड हैं।

आवास बन्धु बना ‘विशेष पिच’, रिटायरमेंट के बाद भी खेल जारी

साफ है कि शासन और बड़े अधिकारी इस दोहरी नीति के प्रशंसक हैं।
इसीलिए आवास बन्धु को रिटायर अधिकारियों के लिए विशेष पिच और मैदान बना दिया गया है, जहां वे रिटायरमेंट के बाद भी नीतियों से खेलते रहते हैं, और कीमत चुकाती है जनता।

सबसे बड़ा सवाल

क्या आवास बन्धु सलाहकार संस्था है या रिटायर्ड अधिकारियों का पुनर्वास केंद्र?
और यदि यही व्यवस्था चलती रही, तो जनता कब तक इन प्रयोगों का शिकार बनती रहेगी?

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