आलोक वर्मा, जौनपुर ब्यूरो,
सुप्रीम कोर्ट में SIR पर गूंजे सवाल: चुनाव आयोग की सीमाओं पर उठी सबसे कड़ी नज़र
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर 27 नवंबर की सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉय मालिया बागची की पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने जिस ठोस अंदाज़ में अपने तर्क रखे, उसने मामले को एकदम नए मोड़ पर ला खड़ा किया।
सुनवाई के दौरान सामान्य चर्चाओं के बीच जब सिंघवी ने लगभग 53 मिनट तक लगातार कानून की परतें खंगालनी शुरू कीं, तो अदालत में माहौल गंभीर होता गया। बेंच को कई मौकों पर आपसी विमर्श में भी जाना पड़ा—यह संकेत था कि प्रस्तुत तर्क सामान्य दायरों से कहीं आगे जाकर चुनाव आयोग के अधिकारों की जड़ तक पहुंच रहे थे।
चुनाव आयोग के अधिकारों पर सीधा प्रश्नचिह्न
सिंघवी ने साफ कहा कि चुनाव आयोग को देशभर में एक ही समय पर इस प्रकार का व्यापक SIR चलाने का अधिकार ही नहीं है। उनका दावा था कि आयोग की शक्ति केवल किसी एक निर्वाचन क्षेत्र तक सीमित है, न कि पूरे देश को एक साथ SIR के दायरे में लाने तक।
संसद की भूमिका को दरकिनार करने पर सवाल
सिंघवी का दूसरा बड़ा तर्क था कि नागरिकता जैसे विषय पर संसद पहले ही कानून बना चुकी है। ऐसे में चुनाव आयोग समानांतर व्यवस्था खड़ी करके स्वयं को कानून से ऊपर नहीं रख सकता। यह सीधा-सीधा संवैधानिक ढांचे को चुनौती देता है।
प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि कोई मतदाता अपने माता-पिता के कागज़ात उपलब्ध नहीं करा पाता, तो क्या उसे मतदाता सूची से बाहर कर देना न्यायसंगत है? यह न सिर्फ अव्यावहारिक है बल्कि मताधिकार को चोट पहुँचाने जैसा है।
मनमाना वर्गीकरण — अनुच्छेद 14 का उल्लंघन
सिंघवी ने बताया कि 2003 से पहले और बाद के मतदाताओं के लिए अलग-अलग शर्तें रखना समानता के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है। यह मनमानी नीतिगत भेदभाव कहीं से भी संवैधानिक परीक्षण में खरा नहीं उतर सकता।
पहले से मौजूद वैधानिक प्रक्रिया की अनदेखी
मतदाता सूची में नाम हटाने के लिए पहले से ही फॉर्म-7 का प्रावधान मौजूद है। ऐसे में चुनाव आयोग द्वारा एक नई, विशाल और आक्रामक प्रक्रिया शुरू करना उन्होंने अवैध और अनावश्यक बताया।
सुनवाई का निर्णायक मोड़
सुनवाई में मौजूद वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण अग्रवाल ने सिंघवी के तर्कों को इस पूरे विवाद का “टर्निंग पॉइंट” करार दिया। उनका कहना था कि सिंघवी ने न सिर्फ कानून की बारीकियों को विस्तार से रखा बल्कि विरोधी पक्ष के संभावित सवालों का जवाब भी पहले ही समाहित कर दिया।
यह सुनवाई साफ संकेत छोड़ गई कि SIR मामला अब सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया का विवाद नहीं रहा। यह चुनाव आयोग की शक्तियों की सीमा, संसद की भूमिका और मतदाता अधिकारों के संरक्षण जैसे गंभीर संवैधानिक प्रश्नों पर केंद्रित हो गया है। अदालत का अंतिम फैसला न केवल SIR प्रक्रिया बल्कि चुनावी व्यवस्था की बुनियाद पर भी दूरगामी असर डालेगा।