पानी केरा बुदबुदा,अस मानस की जात,एक दिना छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात

पानी केरा बुदबुदा,अस मानस की जात,एक दिना छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात

नीलेश विक्रम
क्राइम फिक्शन के जादूगर
सुरेंद्र मोहन पाठक

उनके अनूठे कथानकों का नशा आज भी लोगों पर तारी रहता है…..
वे इकलौते ऐसे लेखक है, जिनके नाम पर सोशल मीडिया पर सबसे पहले फैंस ग्रुप बने…..
लगभग 7 दशकों से अपनी लेखनी से लोगो के दिलो पर राज करने वाले पाठक साहब, के प्रशंसक पूरी दुनिया में है………पाठकगण उनके अनुपलब्ध उपन्यास ढूंढ- ढूंढ कर पढ़ते है और अविश्वसनीय कीमतों पर खरीदकर अपने संग्रह में रखना पसंद करते है…….

कुछ समय पूर्व उनकी आत्मकथा के तीन भाग भारत के मशहूर प्रकाशनों से छपे है। इन तीन खंडों में उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को दिलचस्प अंदाज में सांझा किया है। उनकी आत्मकथा की लगातार जारी श्रृंखला से उनके लेखन पक्ष का एक नया रूप देखने को मिल रहा है।
उनकी भाषा की रवानगी, कई दशक पीछे जाकर घटनाओं को याद करके उनका ब्यौरा, रोचक तरीके से प्रस्तुत करने के कौशल के, सभी लोग कायल हो गए है। अपनी आत्मकथा से वे, उस समय के, पूरे कालखंड को एक सिनेमा की तरह लोगों को दिखा देते है जो अद्भुत है, कई मित्रों ने इसे एक नया अनुभव बताया।

अब इस बार उनकी आत्मकथा के चौथे बहुप्रतीक्षित भाग “पानी केरा बुदबुदा” के प्रकाशन का जिम्मा मिला है, साहित्य विमर्श प्रकाशन को, शीघ्र ही पानी केरा बुदबुदा आपके हाथों में होगा।

अंडरवर्ल्ड की जरायम दुनिया से हिंदी के साहित्य प्रेमियों को परिचित कराने का श्रेय उन्हें ही है। बॉलीवुड, टॉलीवुड में जिस अंडरवर्ल्ड का जिक्र कंपनी के नाम से किया जाता है उस शब्द का को प्रचलित करने का श्रेय उन्हें ही है।

यूं तो साहित्य को समाज का दर्पण कहां जाता है लेकिन इसे वास्तविक दर्पण बनाने का साहस जिन लेखकों ने किया है उनमें सुरेंद्र मोहन पाठक का नाम सबसे ऊपर है।

समाज में अलग अलग लोगों का स्वभाव भी अलग अलग होता है। कर्त्तव्यपरायण, ईमानदार, मेहनती, खुशमिजाज…..भावुक, प्रेम से भरे, दोस्ती पर अपना सब कुछ कुर्बान करने वाले लोग संसार की शोभा बढ़ाते है।
लेकिन लालच, स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष, धोखा, फरेब की घटनाएं समाज में ही घटित होती है। आए दिन अखबारों के पन्ने इसी प्रकार की खबरों से रंगे रहते है। अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठक जी सभी प्रकार की मानवीय कमजोरियों का समावेश करके, समाज का वास्तविक रूप दिखाकर और इन सब से बचने का कोई संदेश देते हुए, मजबूत इच्छा शक्ति वाले पात्रों को आदर्श रूप में प्रस्तुत कर देते है।
वीभत्स, हास्य, रौद्र, वीर, करुण, भयानक, शांत, श्रृंगार, अद्भुत, भक्ति, वात्सल्य आदि सभी रसों का चित्रण उनकी रचनाओं में मिलता है

पाठक साहब की लेखनी से कई लोगो को निराशा से उबरने में मदद मिली है। आशावाद के प्रबल वाहक उनके किरदार पढ़ने वाले में असीमित जोश और ऊर्जा भर देते है। बुरे काम का अंजाम हमेशा बुरा होता है जैसी सीख भी उनके कथानको को पढ़ कर हमें मिलती है।

विमल, सुनील, सुधीर, जीतसिंह सीरिज के उपन्यासों के अतिरिक्त उनके लिखे थ्रिलर उपन्यास भी बहुत लोकप्रिय हैं।
उनकी लिखी जोक बुक्स हमेशा डिमांड में रहती है। उन्होंने 02 सामाजिक उपन्यास और 02 बाल उपन्यास भी लिखे थे, जो आज दुर्लभ श्रेणी में है।

उन्होंने विमल, सुनील, सुधीर, जीतसिंह, विवेक अगाशे, विकास गुप्ता, मुकेश माथुर और प्रमोद जैसे स्थापित किरदारों के अलावा रमाकांत, तुकाराम, इमरान, इरफान, विक्टर, मुबारक अली, गोपाल आवतरमानी, इंस्पेक्टर अष्टेकर, लल्लू उर्फ लालचंद, राहुल आदि अनगिनत यादगार पात्रों के माध्यम से एक वृहद कथा संसार बनाया है।

तो आइए स्वागत करते है उनकी आत्मकथा के चौथे भाग का

पानी केरा बुदबुदा|
का

साहित्य विमर्श प्रकाशन की गौरवशाली पेशकश

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