डॉक्टर मीरा दुबे
वरिष्ठ प्रवक्ता, अर्थशास्त्र
पीएम श्री केन्द्रीय विद्यालय, कैंट कानपुर
आधुनिक दौर की नारी का बदलता स्वरूप
सुधी पाठकों, यह एक गंभीर विषय होने के साथ-साथ संवेदनशील भी है.
इसलिए हम इस असमंजस में थे की बात कहाँ से शुरू करें. तभी सामने अख़बार में छपा एक दिल दहलाने वाला विज्ञापन नजर आया.
“मैं (नाम) फलां तारीख को फलां (लड़की) से शादी करने जा रहा हूँ, किसी प्रेमी को आपत्ति हो तो निम्न पते पर सात दिनों में लिखित रूप में आपत्ति दर्ज कराये,
हाल ही में ही घटी कुछ घटनाओं ने शादी करने वालों को अपनी जान की चिंता में डाल दिया है. अब शादी का विज्ञापन कम और शादी से पहले यह अनोखा विज्ञापन ज्यादा निकलने लगा है.आने वाले समय में लड़की पक्ष की ओर से भी इसी तरह के विज्ञापन ज्यादा देखने को मिल सकते हैं. क्यों की अब पत्नियां ही नहीं, बल्कि पति भी सुपारी दे रहे हैं. भारत की नारी, जो प्रेम, दया,संवेदना और ममता की मूर्ति रही है, आज के युग में उसके अमर्यादित, अश्लील और हिंसात्मक स्वरूप की कल्पना से दिल दहल जाता है. नारी का यह विनाशकारी रूप हमें गम्भीरता से सोचने पर मजबूर करता है. क्या प्रेम अब छल का वेष धारण कर आता है? क्या रिश्ते इतने खोखले हो गए हैं? क्या प्रेम की परिभाषा अब सुपारी से जुड़ गयी है?नव विवाहिता शक की नजर से देखी जाएगी? क्या विवाह अब विश्वास नहीं वारदात बनता जा रहा है? इन सवालों के जवाब हमें और आप को ढूंढने होंगे.गृहस्थी की नींव कमजोर पड़ती जा रही है. संस्कारविहीन शिक्षा, सहनशक्ति की कमी, आधुनिकता का आडम्बर, समाज का भय न होना और जुबंदरजी ये आज की शिक्षित नारी की विशेषताएं बन गयी है. पहले विवाह के समय माता-पिता कहते थे “मेरी बेटी गृह कार्य में दक्ष और सुशील है.” अब कहते हैं “मेरी बेटी नाजों से पली है. आज तक हमने तिनका भी नहीं उठवाया”
तो फिर शादी के बाद वह करेगी क्या? सबसे ज्यादा बदलाव महिलाओं में देखने को मिल रहा है. दिन भर मनोरंजन, मोबाईल, स्कूटी/कर पर घूमना, शॉपिंग करनाऔर फिर ब्यूटीपार्लर में घंटों लाइन लगाना, लेकिन भोजन बनाने और परिवार के लिए समय निकलने की फुर्सत नहीं. बुजुर्ग तो घर में चौकीदार बन कर रह गए हैं. कड़ी और सदीम का हटना तो ठीक है, लेकिन ऐसे बेहूदा कपडे? हमारी वेशभूषा, जो शालीनता की निशानी
थी , आज अभद्रता और अश्लीलता की पहचान बनती जा रही है. शादी में हर तरफ फूहड़ता वरमाला, स्टेज और फेरों पर.
और हम यह सब तमाशा देख रहे हैं खुश होकर, ताली बजाकर या मौन रह कर. यह गिरावट अचानक नहीं आई है. यहाँ एक लम्बी साजिश और प्रशिक्षण का नतीजा है. भारत को कमजोर करने के लिए भारतीय परिवारों की व्यवस्था को तोडा जा रहा है. यह कार्य महिलाओं को भ्रष्ट और नशेड़ी बनाये बिना संभव नहीं, क्योंकि, नारी ही समाज और परिवार की धुरी है. मोबाइल पर बोल्ड वीडियो देखने और सोशल मिडिया की क्वीन बनने की दौड़ में बेटियां अब बहू नहीं रहीं. वे ऐसी बन गयी हैं , जो पति को एटीएम,ससुराल को कैद और नाजायज रिश्तों को निजी च्वाइस मानती हैं. आजकल पतिमकी नौकरी पाने के लिए पत्नी द्वारा उसकी हया, हनीमून पर ही पति को मरवा देना ऐसी घटनाओं का अचानक बढ़ना चिंता का विषय है है. इन दुश्चरित्र महिलाओं के चेहरों पर अपराधबोध तक नहीं दिखाई देता. इसका एक कारण यह भी है कि वेब सीरीज, टीवी सीरियल और फिल्मों में ऐसी घटनाओं को सामान्य रूप में पिछले कई सालों से दिखाया जा रहा है. . उनके अनुसार यह गलत नहीं, बल्कि समाज में अब आम बात है. आज भरोसे के रिश्ते तार-तार हो रहे हैं. युवा पीढ़ी भटकाव के दौर में है. वे अपनी संस्कृति और संस्कारों से अपरचित हैं. अफ़सोस की बात है कि भटकते युवाओं का मार्गदर्शन करने वाले बुजुर्ग भी नजर नहीं आ रहे हैं. निह सण्डेह , संस्कार जीवन रूपी ईमारत की नींव है. इसलिए हमें अपने संस्कारों के संरक्षण की सख्त जरूरत है. सरकार का बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ नारा भी बेटी को संस्कारित बनाओ के बिना अधूरा है. यहाँ संस्कारों से तात्पर्य धार्मिक संस्कारों से नहीं, बल्कि उन सामाजिक संस्कारों से है, जो मनुष्य में नैतिकता और सदाचार का समावेश करते हैं. संस्कार कानाम लेते ही आज के युवा, विशेषकर युवतियां, नकारात्मक सोचने लगतीं हैं. उन्हें लगता है कि संस्कारों की मर्यादा में रहकर स्वंतंत्र जीवन जिया नहीं जा सकता. इसलिए वे आधुनिकता ी दौड़ में संस्कारों से दूरमौती जा रही हैं. न केवल युवा बल्कि उम्रदराज लोगों के रहन-सहन , खान-पान, बोलचाल, पहनावे और व्यवहार में भी एक तरह की उच्छृंखलता आ गयी है,जो जमारी संस्कारहीनता का परिणाम है. हमने अपनी मर्यादाओं को तिलांजलि दे दी है. सबने जैसे मान लिया हो,”यवाद जीवेत सुखम जीवेत” आप बेटियों को आकाश देना कहते हैं ठीक है दीजिये, लेकिन पंख देने से पहले उनके चारित्रकि जड़ें मजबूत कीजिये. संस्कारहीन बेटी जहर और बारूद बन सकती है. मानते हैं कि पहले नारी शैक्षिक और आर्थिक रूप से इतनी सशक्त नहीं थी. अब उनके पास साडी आजादी, सुविधाएँ और सुख हैं, फिर भी और चाहिए. आखिर इस मृगत्रिश्ना का अंत कब और कैसे होगा? आज लड़की को ब्वाय फ्रेंड चाहिए, पति की संपत्ति चाहिए, लेकिन पति नहीं चाहिए. अब बहुत हुआ. समाज को अब चुप रहने का हक़ नहीं है. रघुवंशी जैसे लाखों बेटे, दामाद भाई अब केवलटलक और झूठे मुकदमे ही नहीं झेल रहे हैं बल्किसीधे मारे जा रहे हैं या आत्महत्या के लिए मजबूर किये जा रहे हैं. सबसे शर्मनाक बात यह है कि कोई बोल नहीं रहा है.
नारीवाद की आड़ में सुनियोजित अपराध पनप रहे हैं. समय की मांग है कि फिल्मों, सीरियल और वेब सीरीज के माध्यम से परिवार तोड़ने और नशाखोरी को बढ़ावा बढ़ावा देने वाले कंटेंट पर रोक लगे. स्कूली पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा और सदाचार को पुनः शामिल किया जाये. यदि अब भी हम चुप रहे, तो यह एक दिन हम सभी को अपनी चपेट म्रे लड़ लेगी. हमें अपनी बेटियों को फिर वही संस्कार सिखाने होंगे.
कि शादी दो आत्माओं का मिलन है, सौदेबाजी नहीं. पति-पत्नी जीवनसाथी होते हैं, दुश्मन नहीं. जब बेटी के हाथ में किताब की जगह मोबाईल और दिल में संस्कारों की जगहवास्ना हो, तो वह घर बसाने नहीं, जला देने आती हैं. सोनम रघुवंशी ने ऐसा ही किया. अगली बार कहीं आपका बेटा, भाई या दामाद न हो.
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स्वरूप
